एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। भाजपाई अब माँ जैसे पवित्र शब्द को भी चुनावी हथियार बनाकर वोट लेने का कुत्सित प्रयास कर जनता को ठगने का कार्य कर रही है। यह देश के राजनीति और लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।
भाजपा नेताओ के हालिया बयान एवं भाजपा द्वारा वर्तमान मे की जा रही राजनीति पर आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने 4 सितंबर को तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
नायक ने कहा कि अब भाजपा की राजनीति मां जैसे शब्दो पर अटक गई है। जनता के असली मुद्दे यथा बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य हाशिये पर चले गए है। भाजपा के पाखंड पर तीखा प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि अब भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी माँ जैसे पवित्र शब्द को वोट की गंदी सियासत का हथकंडा बनाकर जनता को बेवकूफ बना रही है। कहा कि भाजपा आज जनता के बुनियादी सवालो पर अपने जुबान मे ताला लगा ली है, लेकिन माँ के नाम पर ड्रामा जोरों पर है। यह घृणित दोहरापन लोकतंत्र को शर्मसार करता है।
नायक ने कहा कि यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीति अब इतने व्यक्तिगत हमलों पर उतर आई है, जहाँ माँ जैसे पवित्र शब्द को भी चुनावी हथियार बना दिया जाय? कहा कि माँ का सम्मान सभी संस्कृति में सर्वोपरि माना जाता है, लेकिन जिस तरह भाजपा वाले इसे वोट की राजनीति के तौर पर लाभ-हानि से जोड़ने मे लगी हैं, वह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वे किसी की भी माँ के लिए अपशब्द स्वीकार्य नहीं किए सकते।
लेकिन भाजपाई नेताओ के आरोपों से यह भी साफ है कि राजनीति में दोहरे मानदंड हावी हो रहे हैं। कहा कि जब भाजपा के नेता विपक्षी परिवारों पर कीचड़ उछालते हैं, तब उनकी नैतिकता कहाँ मर जाती है? जब भाजपा नेताओं द्वारा महिलाओं और विपक्षी परिवारों पर अभद्र टिप्पणियाँ कीं जाती है, तब सत्तापक्ष की ओर से कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाती है। माँ का सम्मान हर भारतीय के रगो में है, लेकिन इसे सत्ता की सीढ़ी बनाना नीचता है।
नायक ने ललकारते हुए कहा कि यह भाजपा की ओछी सियासत अब बंद होनी चाहिए। माँ प्रेम का प्रतीक है, इसलिए मां के नाम पर वोट की सौदागरी नहीं की जानी चाहिए। भाजपा द्वारा जनता के सवालों से मुंह मोड़ने की चाल अब बेनकाब हो चुकि है। अब नेताओं को आत्ममंथन कर लोकतंत्र की मर्यादा बचानी होगी, वरना जनता का भरोसा रौंदा जाएगा।”
नायक ने कहा कि लोकतंत्र की ताकत उसकी गरिमा और संवाद की संस्कृति में है। यदि राजनीतिक संवाद व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो जाएगा तो जनता के असली मुद्दे बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य हाशिये पर चले जाएंगे। भाजपा यही चाहती भी है कि जनता के बुनियादी सवालो पर चुनाव ना हो। अब समय आ गया है कि सभी पार्टी के नेतागण चाहे सत्तापक्ष के हो या विपक्ष के सभी पार्टी के नेताओ को अब आत्मचिंतन करना चाहिए। माँ शब्द केवल चुनावी भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशीलता, करुणा और सम्मान का प्रतीक है।
यदि नेता इस शब्द को राजनीतिक हथियार बनाएँगे तो जनता का विश्वास और राजनीति की मर्यादा दोनों ही तार तार हो जाएंगे। आज इस बात की ज़रूरत है कि देश के सभी पार्टी के नेता अपनी भाषा में संयम बरतें और मतभेदों को विचारों और नीतियों के स्तर पर रखें, न कि परिवार और व्यक्तिगत जीवन पर।
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