संत रामलखन दास ने 1962 में चीनी आक्रमण पर हाजीपुर की सभा में की थी सिंह गर्जना
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। भारत के संत सिर्फ धर्म और अध्यात्म में ही रमें नहीं रहते। जब देश पर धर्म संकट आता है तो वे नागा संन्यासियों की तरह हुंकार भी भरते हैं। तन, मन और धन से सहयोग भी करते हैं।
ऐसे ही संत थे सारण जिला के हद में सोनपुर में अवस्थित लोकसेवा आश्रम के संत स्व. बाबा राम लखन दास। सन् 1962 में चीन की लाल सेना ने जब भारत पर आक्रमण कर दिया था, तब हाजीपुर कचहरी मैदान की एक सभा में शास्त्रीय संगीत नृत्य मर्मज्ञ सोनपुर स्थित लोक सेवा आश्रम के संस्थापक संत बाबा राम लखन दास ने सिंह गर्जना की थी। उन्होंने कहा था कि उठो जागो गुरु भाइयों, धर दो कुछ दिन कंठी माला। दुश्मन चढ आया भारत पर, हाथ में ले लो राइफल भाला।
इस सिंह गर्जना ने साधु संन्यासियों के भीतर ऊर्जा भर दिया और उन संतों ने भी देश पर आई संकट की बेला में अर्थ दान किया था। सोनपुर स्थित अपने आश्रम में उन्होंने अखिल भारतीय स्तर की संगीत महोत्सव की नींव डाली। जिसमें राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकारों ने अपनी सहभागिता दर्ज करायी। आज भी आश्रम के मंच पर शास्त्रीय नृत्य, संगीत एवं वाद्य से जुड़े कलाकार स्व. बाबा राम लखनदास को अपनी कला का प्रदर्शन कर श्रद्धांजलि अर्पण करने आते हैं।
कहते हैं कि विधाता का लिखा टाला नहीं जा सकता और कब क्या अनहोनी घटित हो जाए कहा नहीं जा सकता। सात अगस्त 1969 की रात्रि सोनपुर की धरती के लिये काल रात्रि बनकर आयी। किसी आततायी ने बाबा राम लखन दास की सोए अवस्था में हत्या कर दी। बाबा शहीद हो गये, परन्तु कलाकारों की वाणी में बाबा आज भी वे जीवंत हैं।
भोर हुई तब धरती का कण-कण सुबह में सुबक उठा। जो सुना वही रो पड़ा। सुगम, शास्त्रीय नृत्य, गीत एवं संगीत से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हस्तियां भी विलख उठीं, क्योकि स्व. संत बाबा राम लखन दास सिर्फ संत ही नहीं, बल्कि वे एक समाजसेवी, देशभक्त क्रांतिकारी और कला मर्मज्ञ भी थे।
उन्होंने ने ही सर्वप्रथम सन् 1945 में सोनपुर में संगीत की अखंड ज्योति जलायी थी। पहले अखिल भारतीय संगीत समारोह का आयोजन प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दो दिन बाद यानी भाद्रपद दशमी को बड़े धूम -धाम से संपन्न होता था, परंतु उनकी शहादत ने कलाकारों को हिला दिया। अब 6 सितम्बर सन् 1969 भाद्रपद कृष्ण पक्ष दशमी की रात्रि का अंतिम प्रहर लोक सेवा आश्रम का कला मंच (प्रेक्षा-गृह)। अचानक विश्व प्रसिद्ध शहनाई सम्राट बिस्मिल्ला खां (अब भारत रत्न) की शहनाई दर्द बिखेरती गूंज उठती है। दिल का खिलौना हाय टूट गया…. कोई लुटेरा आ के लूट गया।
दिवंगत संत बाबा राम लखन दास के संबंध में उनके शिष्य व लोक सेवा आश्रम के व्यवस्थापक संत स्व.बाबा रामदास उदासीन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि बाबा रामलखन दास का शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव से क्रांतिकारी रिश्ता था। राष्ट्रपति बनने से पूर्व डॉ राजेन्द्र प्रसाद का भी यहां आगमन होता रहता था। जब कभी उलझनों में उलझकर अशांत होते, वे लोक सेवा आश्रम में आकर अक्सर बाबा से मिलते थे। उन्हें यहां अटूट शांति मिलती थी।
सन् 1962 के भारत पर चीनी आक्रमण के दौरान देश के सुरक्षा कोष में दस हजार रुपये प्रदान कर बाबा राम लखन दास ने राष्ट्र भक्ति का सर्वोतम उदाहरण पेश किया था।
उनका जन्म सन् 1977 ई. में मउरानीपुर झांसी (उ.प्र.) में हुआ था। इनके बचपन का नाम पंडित लक्ष्मण अरजरीया था तथा इनके पिता पंडित कालुराम शास्त्री थे। वे गौर ब्राह्मण कुल के थे।
बाबा राम लखन दास की शहादत ने कलाकारों को बाबा की पुण्य तिथि 7 अगस्त के अवसर पर संगीत समारोह आयोजित करने की प्रेरणा प्रदान की। सन् 1969 के उसी श्रद्धांजलि संगीत समारोह में भारत रत्न विस्मिल्ला खां, शहनाई सम्राट एवं पद्म विभूषण तबला सम्राट पं. किशनजी महाराज ने सर्वसम्मति से फैसला लिया कि प्रतिवर्ष की भांति इस पारम्परिक संगीत सम्मेलन का अगली बार से बाबा राम लखन दास की शहादत दिवस पर मनाया जाय। इस स्मृति एवं श्रद्धांजलि सभा में हिन्दुस्तान के तमाम कलाकार निःशुल्क श्रद्धांजलि समर्पण करेंगे।
इस कला मंच पर अब तक शहनाई सम्राट बिस्मिल्ला खां, तबला सम्राट पद्मश्री पं. किशनजी महाराज, ठुमरी गायिका बृजबाला देवी, पं.कंठेजी महाराज, तबला,पं. अनोखेलाल, तबला अलखनंदा, नृत्यांगना रौशन कुमारी, कतीक नृत्यांगना पं. शांता प्रसाद, तबला सी. रामचन्द्र, संगीत निर्देशक उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, नृत्याचार्य पंडित दुर्गा लाल, वाराणसी, पद्मश्री गोपाल प्रसाद मिश्रा सारंगी वादक, माया चटर्जी नृत्यांगना कोलकाता, मधु मिश्रा नृत्यांगना वाराणसी, रवि शंकर मिश्रा नृत्य वाराणसी, पद्मश्री पं. सियाराम तिवारी, पं. श्यामदास मिश्रा, पं. कृष्णाजी महाराज नृत्य निर्देशक विरजू महाराज, कपूर मिश्र, अनोखे लाल, एशिया प्रसिद्ध मिश्र बंधु अमरनाथ पशुपतिनाथ जैसे ख्याति प्राप्त कलाकारों ने निःशुल्क सेवा की है।
बाबा राम लखन दास को अपनी जन्मभूमि से गहरा लगाव था। जो उनकी वार्ताओं के क्रम में परीलक्षित हुए बिना नहीं रह पाती थी। कहते मैं वहां का रहनेवाला हूं जहां की एक छोकरी ने सारी दुनिया को हिला के रख दिया था। जब वे क्षुब्ध होते तो आक्रोश पूर्ण लहजे में कहते कि दरियाई नारियल कमंडल से एक बूंद जल छिड़क दूंगा तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायेगा। महज एक लंगोटी एवं एक कमंडल धारी इस संत में वह कौन सी सिद्धियां थीं कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकारों ने सोनपुर में निःशुल्क आकर माथा टेका तथा अपनी कला साधना की परीक्षा दी? यह सदैव शोध का विषय बना रहेगा।
![]()













Leave a Reply