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संत रविदास थे जाति उन्मूलन, समता व् मानवीय गरिमा के अमर क्रांतिकारी-नायक

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड की राजधानी रांची के वरिष्ट कांग्रेसी नेता विजय शंकर नायक की नजरों में संत रविदास भारतीय इतिहास के उन महान संतों और समाज सुधारकों में से हैं, जिन्होंने मध्यकालीन भारत में जाति, छुआछूत और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध एक वैचारिक और नैतिक क्रांति का नेतृत्व किया।

नायक ने बताया कि संत रविदास का जन्म लगभग 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) में एक तथाकथित निम्न जाति के परिवार में हुआ था, किंतु उनके विचारों और कर्मों ने जन्म से दी गई सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर मानवता की सर्वोच्च गरिमा को प्रतिष्ठित किया।

रविदास का जीवन संघर्ष, अपमान और अन्याय के विरुद्ध आत्म सम्मान की लड़ाई का प्रतीक रहा। जूता बनाने जैसे श्रम प्रधान कार्य को वे आत्म गौरव और ईश्वर-भक्ति का माध्यम मानते थे। उन्होंने सिद्ध किया कि श्रम अपमान नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा का आधार है। उन्होंने बताया कि संत रविदास के लिए भक्ति मंदिरों और कर्मकांडों तक सीमित नहीं थी। भक्ति का अर्थ था अन्याय, भेदभाव और अहंकार का त्याग।

नायक ने बताया कि संत रविदास ने स्पष्ट कहा कि ईश्वर किसी जाति, वर्ग या वर्ण का बंधक नहीं है। उन्होंने ब्राह्मणवादी वर्चस्व, कर्मकांड और झूठे धार्मिक आडंबरों पर तीखा प्रहार किया। उनकी वाणी सीधे-सीधे सामाजिक असमानता और पाखंड को चुनौती देती है। “मन चंगा तो कठौती में गंगा। इस दोहे के माध्यम से रविदास यह स्थापित करते हैं कि पवित्रता बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि मानव के अंतर्मन की शुद्धता में निहित है। यह विचार उन शक्तियों पर सीधा प्रहार है, जो धर्म को सत्ता और वर्चस्व का औज़ार बनाती रही है।

नायक ने कहा कि संत रविदास का सबसे क्रांतिकारी विचार था जाति-उन्मूलन। वे मानते थे कि जाति मनुष्य द्वारा मनुष्य पर थोपी गई एक अमानवीय व्यवस्था है। उन्होंने कहा था कि जाति-पांति पूछे न कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।
यह पंक्ति आज भी जातिवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक घोषणा पत्र की तरह है। संत रविदास ने स्पष्ट कर दिया था कि ईश्वर के सामने कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई श्रेष्ठ या हीन नहीं, केवल मानवता है।

उन्होंने केवल आध्यात्मिक सुधार की बात नहीं की, बल्कि एक समतामूलक समाज की परिकल्पना भी प्रस्तुत की। उनका प्रसिद्ध स्वप्न बेगमपुरा एक ऐसे समाज का प्रतीक है, जहाँ न कोई दुखी है, न शोषित, न जाति का बंधन है, न गरीबी का आतंक। यह विचार आधुनिक संविधान, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों से गहराई से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न।

नायक ने कहा कि यह केवल आध्यात्मिक आकांक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय की दूरदर्शी घोषणा है। कहा कि संत रविदास ने स्त्री समानता, श्रम की प्रतिष्ठा और दलित स्वाभिमान को भी अपने चिंतन का हिस्सा बनाया। उनके विचार उस युग में विशेष रूप से क्रांतिकारी थे, जब दलितों को शिक्षा, मंदिर और सार्वजनिक जीवन से वंचित रखा जाता था। उन्होंने न केवल इस अन्याय को उजागर किया, बल्कि इसके विरुद्ध चेतना का निर्माण भी किया।

उनकी वाणी पाखंड, ढोंग और झूठी धार्मिक सत्ता पर करारा प्रहार करती है। पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़। यह पंक्ति उन सभी ताकतों के विरुद्ध चेतावनी है, जो धर्म को अंधविश्वास और शोषण का माध्यम बनाती हैं। उन्होंने कहा कि आज जब देश में जातिगत हिंसा, दलित उत्पीड़न और सामाजिक भेदभाव की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं, संत रविदास की विचारधारा पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है। उनकी शिक्षाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि सामाजिक न्याय केवल कानून से नहीं, बल्कि चेतना, नैतिकता और सामूहिक संघर्ष से प्राप्त होता है।

ज्ञात हो कि संत रविदास का जीवन जन्म से मृत्यु तक संघर्ष, साहस और समता की प्रेरक गाथा है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि क्रांति केवल सत्ता से नहीं, बल्कि विचारों से जन्म लेती है। वे केवल एक संत नहीं, बल्कि एक जाति-तोड़क दार्शनिक, सामाजिक क्रांतिकारी और मानवाधिकारों के अग्रदूत थे।
आज आवश्यकता है कि हम संत रविदास को केवल धार्मिक संत के रूप में नहीं, बल्कि दलित मुक्ति, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा के वैश्विक प्रतीक के रूप में स्वीकार करें और उनके स्वप्नों के अनुरूप एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और पाखंड-मुक्त समाज की स्थापना के लिए संघर्ष जारी रखें।

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