अखिल भारतीय 86 वां शास्त्रीय संगीत, वाद्य एवं नृत्य महासंगम आज
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। अखिल भारतीय 86वां शास्त्रीय संगीत, वाद्य एवं नृत्य महासंगम 7 अगस्त को सारण जिला के हद में सोनपुर के लोकसेवा आश्रम के प्रेक्षा-गृह में आयोजित होगा। इसके साथ ही उन कलाकारों की यादें भी ताजी हो गयी, जिन्होंने बिहार के इकलौते इस मंच पर गरिमा के साथ अपनी संगीत साधना द्वारा इसको पुष्पित पल्लवित करने का काम किया था।
इस प्रेक्षा-गृह के मंच पर पिछले 86 वर्षों से देश के राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शास्त्रीय संगीत, वाद्य एवं नृत्य में दक्ष कलाकारों ने आकर निःशुल्क कार्यक्रम प्रस्तुत किया। यह सिलसिला आज भी जारी है। अब तक शास्त्रीय नृत्य, संगीत एवं वाद्य के बड़ी-बड़ी हस्तियों ने तबले की थाप पर नृत्य, गायन व शहनाई की धुन पर अपनी कला साधना का यहां अप्रतिम परिचय दिया, जिसकी अनुगूंज अब भी यहां के वातावरण में सुनाई पड़ती है।
ज्ञात हो कि यहां आने वाले कलाकार बड़े हो या छोटे सभी संत बाबा स्व. रामलखन दास को अपनी कला साधना का परिचय देते नहीं अघाते। सभी बाबा का आशीर्वचन का ख्वाहिश रखते हैं और भाव रहता है समर्पण का। बताया जाता है कि लोक सेवा आश्रम के संस्थापक संत बाबा रामलखन दास ने ही अपने आश्रम में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ किया था। वर्तमान प्रेक्षागृह बनने से पूर्व आश्रम के भीतर जगत पर ही शास्त्रीय नृत्य संगीत एवं वाद्य का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता था। तबला वादक पद्म विभूषण से सम्मानित पं.किशनजी महाराज, वाराणसी के फुफेरे भाई प्रसिद्ध कत्थक नर्तक पं. जोखू महाराज ने इस मंच पर 35 वर्ष तक नृत्य किया था, परन्तु सात अगस्त 1969 को बाबा रामलखन दास की आश्रम में हत्या के बाद उनकी पुण्यतिथि पर यह कार्यक्रम होने लगा।
कत्थक नर्तक जोखू महाराज, ठुमरी गायिका बृजबाला देवी, वज्जन खां गायक मुजफ्फरपुर, खुन्नू मिश्र तबला वादक आजमगढ़ ने एक साथ 1942-43 में सांस्कृतिक कार्यक्रम में पहली बार शिरकत की थी। सारंगी वादक मुजफ्फरपुर के नसीरूद्दीन थे। पं. किशनजी महाराज के पिता कण्ठे महाराज, तबला, वाराणसी के जोखू महाराज के छोटे भाई सामता प्रसाद उर्फ गोदई महाराज तबला दिल्ली, कथक क्वीन पद्मश्री सितारा देवी, उनकी बड़ी बहन तारा देवी, वाराणसी ने भी अपने कला साधना का परचम यहां लहराया। भारत रत्न शहनाई वादक विस्मिल्ला खां तो इस मंच के बाद में अध्यक्ष ही बन गये। पद्म विभूषण से सम्मानित पं. किशनजी महाराज भी सांस्कृतिक कार्यक्रम के संस्थापक सदस्यों में से थे।
बाबा रामलखन दास के शिष्य परंपरा की सुशीला देवी, बृजबाला देवी (मुजफ्फरपुर) का नाम तो भूलाया ही नहीं जा सकता। कोलकाता की प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना कथक गुरु माया चटर्जी तो इस मंच की जान ही थी। 6 सितम्बर 1969 को इस कला मंच पर एक साथ पद्मश्री से विभूषित ख्याति प्राप्त कलाकारों ने जुटकर बाबा रामलखन दास को श्रद्धांजली दी, उनमें पद्मश्री किशनजी महाराज, डॉ बीजी जोग (वायलीन), गोपाल प्रसाद मिश्रा, प. सियाराम तिवारी के अतिरिक्त कोलकाता की प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना माया चटर्जी, प्रसिद्ध नृत्य निर्देशक प. कृष्णाजी महाराज, विरजू महाराज, वृजबाला देवी, कपूर महाराज, याजिम खां शामिल थे।
बिहार के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रह्मनाद गायक इस मंच के आज भी प्राण ही है। इसके अतिरिक्त बड़े गुलाम अली खां (लाहौर) जो कोलकाता में रहते थे ने भी इस मंच पर कार्यक्रम प्रस्तुत किया। मधु मिश्रा (कत्थक नृत्य वाराणसी), जयंती मुखर्जी (नृत्य कोलकाता), अर्जुन महाराज (नर्तक) आदि सैकड़ों ऐसे नाम है जो एक से बढ़कर एक है, जिन्होंने यहां आकर श्रद्धांजली दी। विस्मिल्ला खां की शहनाई के गीत के तो बोल ही होते थे दिल का खिलौना हाय टूट गया, कोई लुटेरा आके लूट गया।
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