अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। हृदय में भक्ति का अनहद नाद और आंखों में प्रेमाश्रु… कुछ ऐसा ही विहंगम दृश्य था सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम का, जहां श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के समापन पर आस्था का महासागर उमड़ पड़ा।
ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन 23 मई की वेला केवल एक कथा का अंत नहीं, बल्कि हज़ारों आत्माओं के जागरण का उत्सव बन गई। पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्यजी महाराज की अमृतवाणी ने श्रद्धालुओं को इस नश्वर संसार से ऊपर उठाकर सीधे गोलोक धाम का दिग्दर्शन करा दिया।
कथा के मंच से जगद्गुरु स्वामी लक्ष्मणाचार्यजी ने जब भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं के दिव्य प्रसंग की व्याख्या की, तो पंडाल में सन्नाटा छा गया। उन्होंने संसार की सबसे बड़ी सच्चाई को रेखांकित करते हुए कहा कि बिना गुरु के इस अथाह भवसागर को पार करना असंभव है। कहा कि ‘गु’ का अर्थ है भीतर का अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है उस अंधकार को चीरने वाला अलौकिक प्रकाश।

स्वामीजी ने स्पष्ट किया कि माता, पिता, श्वसुर और मामा ये चार हमारे लौकिक गुरु हैं जो हमें संसार में जीना सिखाते हैं। परंतु, इस जन्म-मरण के चक्रव्यूह को भेदकर शाश्वत मुक्ति (मोक्ष) पाने के लिए श्रीसम्प्रदाय के विरक्त, वैष्णव आचार्य की शरणागति ही एकमात्र मार्ग है। उन्होंने उद्घोष किया कि मोक्षं ईच्छेत जनार्दनात् यदि परम कल्याण की इच्छा है, तो केवल और केवल श्रीमन्नारायण की शरणागति और उनके नारायण मंत्र में ही वह सामर्थ्य है।
राजा परीक्षित का मोक्ष: मृत्यु के भय पर शाश्वत विजय
कथा प्रसंग में स्वामीजी ने राजा परीक्षित के मोक्ष के प्रसंग को जब जीवंत किया, तो श्रवण कर रहे तमाम श्रद्धालु का हृदय वैराग्य से भर उठा। एक शाप के कारण सातवें दिन तक्षक नाग द्वारा मृत्यु का दंश झेलने को विवश राजा परीक्षित जब भयभीत हुए, तो उन्हें शुकदेवजी के रूप में ‘गुरु’ मिले।
सात दिनों की भागवत कथा ने राजा परीक्षित के भीतर से मृत्यु के भय को समूल नष्ट कर दिया। जब सातवें दिन तक्षक ने डंसा, तब तक परीक्षित देह-बुद्धि से ऊपर उठ चुके थे। वे सदेह वैकुंठ धाम को सिधार गए। कहा कि भागवत कथा का श्रवण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मृत्यु के भय को मिटाकर जीवन में 126 प्रकार के अलौकिक लाभ प्रदान करने वाला कल्प वृक्ष है।
ज्ञान यज्ञ की तपोमयी पूर्णाहुति पर भगवान की लीलाओं का ऐसा दिव्य मंचन हुआ कि श्रद्धालु खुद को भूलकर झूम उठे। रासलीला के मनोहारी दृश्यों ने सोनपुर की धरती को साक्षात वृंदावन बना दिया। शाम ढलते ही जब भागवत की महाआरती हुई, तो हज़ारों दीपकों की लौ में भक्तों के चेहरे चमक उठे। इसके बाद देर रात तक प्रभु के महाप्रसाद (विशाल भंडारे) का दौर चलता रहा। अंत में स्वामीजी ने सभी यजमानों और भक्तों पर अपनी अहैतुकी कृपा बरसाते हुए आभार व्यक्त किया। यह ज्ञान यज्ञ केवल सात दिनों का आयोजन नहीं, बल्कि सोनपुर के आकाश में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का एक ऐसा सूर्योदय है, जिसकी आभा भक्तों के दिलों में युगों-युगों तक आलोकित रहेगी।
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