भारत की प्रथम सभ्यता आदिवासी, वनवासी राजनीति व् सरना अस्मिता पर संकट
एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। भारत का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यह उस धरती का इतिहास है जहाँ सबसे पहले जंगलों की भाषा बोली गई, नदियों को माता माना गया, पहाड़ों को देवता समझा गया और प्रकृति को जीवन का केंद्र बनाया गया। जब न वेद थे, न पुराण, न मंदिर, न वर्ण व्यवस्था और न ही संगठित हिंदू धर्म का स्वरूप, तब इस भूमि पर आदिवासी सभ्यताएँ जीवित थीं। उक्त बाते झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक ने 26 मई को कही।
नायक ने कहा कि भारत की सबसे पहली सांस्कृतिक धारा आदिवासी धारा थी। यही इस देश की मूल आत्मा है। कहा कि आधुनिक इतिहास, पुरातत्व, मानवशास्त्र और आनुवंशिक (डीएनए) शोध लगातार यह प्रमाणित कर रहे हैं कि भारतीय उप-महाद्वीप में सबसे पहले बसने वाले समुदाय वे थे जिन्हें आज हम आदिवासी, मूलवासी या इंडिगेनेस पीपुल्स कहते हैं। लेकिन आज विडंबना यह है कि जिन समुदायों ने हजारों वर्षों तक इस भूमि, जंगलों और जल स्रोतों की रक्षा की, उन्हीं की ऐतिहासिक पहचान को मिटाने की कोशिश की जा रही है।
वरिष्ठ कांग्रेसी नायक ने जोर देते हुए कहा कि भाजपा और आरएसएस की राजनीति आदिवासी समाज को आदिवासी नहीं बल्कि वनवासी कहकर उनकी मूल निवास पहचान को कमजोर करना चाहती है। सरना धर्म को हिंदू धर्म में समाहित करने का प्रयास हो रहा है और आदिवासी समाज की स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्मिता पर वैचारिक हमला तेज किया जा रहा है। यह केवल शब्दों की लड़ाई नहीं है। यह भारत के इतिहास, पहचान और मूल सभ्यता पर कब्जे की लड़ाई है।
नायक के अनुसार वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि आधुनिक मानव लगभग 65,000 वर्ष पहले दक्षिण एशिया पहुँचे। उस समय भारत में कोई वैदिक धर्म नहीं था। कोई वर्ण व्यवस्था नहीं थी और कोई संगठित धार्मिक ढाँचा मौजूद नहीं था। यहाँ छोटे-छोटे शिकारी, संग्रहकर्ता और प्रकृति-आधारित समुदाय रहते थे। यही समुदाय आगे चलकर आदिवासी सभ्यताओं में विकसित हुए। संथाल, मुंडा, उरांव, गोंड, भील, हो, खड़िया, बैगा, कोरकू और अनेक अन्य आदिवासी समुदाय भारत की सबसे प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं के वाहक माने जाते हैं।
इनकी जीवन शैली प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित थी। जंगल इनके लिए केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन थे। नदी केवल पानी नहीं बल्कि माँ थी। पहाड़ केवल पत्थर नहीं बल्कि देवत्व के प्रतीक थे। उन्होंने कहा कि सिंधु घाटी सभ्यता में वृक्ष पूजा, मातृदेवी पूजा, पशु प्रतीक और प्रकृति-आधारित संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं। अनेक इतिहासकार मानते हैं कि इन तत्वों की जड़ें प्राचीन स्वदेशी और आदिवासी परंपराओं में थी। इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत की पहली सभ्यता प्रकृति-आधारित आदिवासी सभ्यता थी, न कि बाद में विकसित वैदिक-ब्राह्मणवादी व्यवस्था।
उन्होंने कहा कि सरना केवल एक धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से जीवित एक प्रकृति-केंद्रित जीवन दर्शन है। कहा कि सरना का अर्थ ही पवित्र उपवन या पवित्र जंगल होता है। गाँव का सरना स्थल वह स्थान होता है जहाँ पूरा समुदाय सामूहिक पूजा करता है। सरना धर्म किसी एक पुस्तक, पैगंबर या पुरोहित तंत्र पर आधारित नहीं है। इसमें ब्राह्मणवादी वर्चस्व, जाति व्यवस्था, ऊँच-नीच या छुआछूत की कोई जगह नहीं है। यहाँ हर व्यक्ति प्रकृति के सामने समान है। सरना दर्शन के मूल तत्व हैं प्रकृति पूजा, सामूहिकता, समानता, पूर्वजों का सम्मान, जल-जंगल-जमीन की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सामुदायिक जीवन। कहा कि सरहुल में साल वृक्ष की पूजा होती है। करमा प्रकृति और भाईचारे का उत्सव है। सोहराय कृषि और पशुधन से जुड़ा पर्व है।
बहा और माघे प्रकृति चक्र के उत्सव हैं। यह पूरी परंपरा इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी सभ्यता का आधार प्रकृति और समानता रही है, जबकि बाद में विकसित वर्ण व्यवस्था ने समाज को ऊँच-नीच में बाँट दिया। इसीलिए सरना को सनातन हिंदू धर्म का हिस्सा बताना ऐतिहासिक रूप से भ्रामक और राजनीतिक रूप से खतरनाक है।
नायक ने कहा कि इतिहासकारों और भाषाविदों के अनुसार इंडो-आर्यन समूह लगभग 1500 बीसीई के आसपास मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप में आए। ऋग्वेद की रचना इसी काल में मानी जाती है। प्रारंभिक वैदिक संस्कृति घोड़े, रथ, अग्नि यज्ञ और इंद्र, अग्नि, वरुण जैसे देवताओं पर आधारित थी। यह संस्कृति उत्तर-पश्चिम भारत से धीरे-धीरे गंगा के मैदानों की ओर फैली। कहा कि जब वैदिक आर्य यहाँ आए, तब भारत खाली नहीं था। यहाँ पहले से अनेक स्वदेशी और आदिवासी समुदाय बसे हुए थे। ऋग्वेद में दास और दस्यु जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें कई विद्वान स्थानीय समुदायों से जोड़ते हैं।
समय के साथ संघर्ष और सांस्कृतिक मिश्रण दोनों हुए। कई लोक देवी-देवताओं, वृक्ष पूजा और प्रकृति परंपराओं को बाद में हिंदू धर्म में समाहित किया गया। लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया। आज भी सरना परंपरा बिना वेद, बिना ब्राह्मण और बिना वर्ण व्यवस्था के जीवित है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
आदिवासी बनाम वनवासी : शब्द नहीं, राजनीति है
नायक के अनुसार आदिवासी शब्द का अर्थ है इस भूमि के मूल रहिवासी। यही शब्द भाजपा और आरएसएस की राजनीति को असहज करता है। क्योंकि, यदि आदिवासी इस भूमि के मूल रहिवासी हैं, तो फिर यह प्रश्न खड़ा होता है कि बाद में कौन आया? इसी कारण आरएसएस ने आदिवासी शब्द की जगह वनवासी शब्द को बढ़ावा दिया। वर्ष 1952 में स्थापित वनवासी कल्याण आश्रम इसी सोच का परिणाम था। कहा कि वनवासी शब्द आदिवासियों को केवल जंगल में रहने वाला समुदाय दर्शाता है, जबकि आदिवासी शब्द ऐतिहासिक अधिकार, मूल रहिवासी होने और सांस्कृतिक स्वायत्तता का दावा प्रस्तुत करता है। यह केवल शब्द बदलने का प्रयास नहीं है। यह इतिहास बदलने और मूल पहचान मिटाने की राजनीति है।
उन्होंने कहा कि 11 नवंबर 2020 को झारखंड विधानसभा ने सर्वसम्मति से सरना धर्म कोड का प्रस्ताव पारित किया। लेकिन केंद्र सरकार ने आज तक इसे लागू नहीं किया। वर्ष 2011 की जनगणना में लाखों रहिवासियों ने अन्य धर्म के अंतर्गत सरना लिखा। फिर भी सरना को अलग धार्मिक पहचान नहीं दी गई। यदि जैन, बौद्ध और सिख समुदायों को अलग धार्मिक पहचान मिल सकती है, तो सरना धर्म को क्यों नहीं? सरना कोड केवल धार्मिक पहचान का प्रश्न नहीं है। यह जनगणना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, फिफ्थ सेड्यूल क्षेत्रों, आरक्षण और विकास योजनाओं से जुड़ा सवाल है। अलग कोड न मिलने से आदिवासी आबादी कम दिखाई जाती है और उनके अधिकार कमजोर होते हैं।
नायक के अनुसार आज भाजपा और आरएसएस से जुड़े संगठन धर्मांतरित आदिवासियों को एसटी सूची से हटाने की माँग कर रहे हैं। लेकिन भारतीय संविधान का अनुच्छेद 342 स्पष्ट करता है कि अनुसूचित जनजाति (एसटी) की पहचान धर्म आधारित नहीं है। कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में कहा है कि केवल धर्म परिवर्तन से एसटी दर्जा समाप्त नहीं होता। फिर भी डीलिस्टिंग की राजनीति इसलिए की जा रही है, ताकि आदिवासी समाज को हिंदू बनाम ईसाई में बाँटा जा सके। जब समाज विभाजित होगा, तब जल-जंगल-जमीन और खनिज संपदा पर कब्जा करना आसान हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि केंद्र की भाजपा नीत एनडीए सरकार विकास की बात करती है, लेकिन सबसे अधिक विस्थापन आदिवासी क्षेत्रों में हुआ है। खनन परियोजनाएँ, कॉरपोरेट कंपनियों को जमीन हस्तांतरण, जंगलों की कटाई और बड़े उद्योगों के नाम पर लाखों आदिवासी अपने गाँवों से उजाड़े गए। कहा कि झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में देश की सबसे अधिक खनिज संपदा मौजूद है, लेकिन वहीं सबसे अधिक गरीबी, बेरोजगारी और विस्थापन देखने को मिलता है। यह मॉडल विकास नहीं, बल्कि संसाधनों की लूट का मॉडल है।
नायक ने कहा कि आदिवासी समाज ने हमेशा अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया। तिलका मांझी ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। सिदो-कान्हू ने संथाल हूल का नेतृत्व किया। बिरसा मुंडा ने अबुआ दिशुम, अबुआ राज का नारा दिया। टाना भगत आंदोलन ने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। ये केवल विद्रोह नहीं थे। ये जल-जंगल-जमीन, संस्कृति और स्वाभिमान की लड़ाइयाँ थीं। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे पुरानी सांस्कृतिक धारा आदिवासी धारा है। पहले आदिवासी सभ्यता थी, बाद में वैदिक आर्य संस्कृति और फिर हिंदू धर्म का क्रमिक विकास हुआ। आज भाजपा और आरएसएस इतिहास को पलटकर आदिवासी समाज को वनवासी बताने, सरना को सनातन में मिलाने और डीलिस्टिंग के जरिए समाज को बाँटने की कोशिश कर रहे हैं।
यह केवल सांस्कृतिक विवाद नहीं है। यह इतिहास, पहचान और अधिकारों की लड़ाई है। आदिवासी समाज को अपनी जड़ों पर गर्व करना होगा। आदिवासी शब्द को सम्मान के साथ दोहराना होगा। सरना धर्म कोड की लड़ाई को मजबूत करना होगा। क्योंकि हम इस भूमि के पहले रक्षक थे। हमारी संस्कृति सबसे पुरानी है और हमारी अस्मिता किसी राजनीतिक विचारधारा की गुलाम नहीं हो सकती। कहा कि जल-जंगल-जमीन हमारा अधिकार है। सरना हमारा गौरव है और आदिवासी अस्मिता भारत की आत्मा है।
![]()













Leave a Reply