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ओडिशा में क्यों मनाया जाता है राजा पर्व? जानिए इसका मिथुन संक्रांति से सम्बंध

पीयूष पांडेय/बड़बिल (ओडिशा)। हिंदू पंचांग के मुताबिक 15 जून को सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश किया है। सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश करने को ही मिथुन संक्रांति कहा जाता है।

इस खास अवसर पर देश के ओडिशा राज्य में एक खास पर्व राजा पर्व मनाया जाता है। यह पर्व आमतौर पर तीन से चार दिनों तक चलता है। इस दौरान धरती माता और नारीत्व के प्रति सम्मान और आस्था का भाव देखने को मिलता है।

राजा पर्व क्यों मनाया जाता है?

दरअसल ओडिशा की पारंपरिक मान्यताओं के मुताबिक मिथुन संक्रांति के दौरान धरती माता रजस्वला होती हैं। जिस तरह महिलओं को मासिक धर्म के दौरान आराम करने दिया जाता है, उसी तरह इस खास दिन पर धरती माता को विश्राम देने की परंपरा निभाई जाती है। इसलिए उड़ीसा में राजा पर्व के दौरान खेती-बाड़ी, जुताई और भूमि की खुदाई जैसे कार्यों को करने से बचा जाता है। राजा पर्व से जुड़ी अनोखी परंपरा के अनुसार राजा पर्व के दौरान महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं। इस दौरान महिलाओं को रसोई घर में जाने की मनाही तथा पैरों में चप्पल पहनने से भी रोका जाता है। उन्हें नंगे पांव रखते की परंपरा है।

तीन दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दौरान बिना पका भोजन करने के साथ नमक खाने की भी मनाही होती है। हालांकि शहरी हिस्सों में रहने वाली कई महिलाएं इन नियमों का पालन नहीं करती हैं, मगर ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाएं रजोत्सव त्योहार को श्रद्धा के साथ मनाती हैं।

राजा पर्व के दौरान रहिवासी महिलाएं नए कपड़े पहनते हैं, इसके अलावा वे झूले झूलते हैं। पारंपरिक खेलों में हिस्सा लेने के साथ खास तरह के पकवानों का लुफ्त उठाते हैं। इसके अलावा घर की महिलाएं लोक गीत गाती हैं। इस दौरान धरती माता को विश्राम देने की परंपरा निभाई जाती है।

जानकारी के अनुसार राजा पर्व की शुरुआत मिथुन संक्रांति के दिन से ही होती है। सूर्य का मिथुन राशि में प्रवेश करना ही इस उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। इसलिए ओडिशा में मिथुन संक्रांति सिर्फ राजा पर्व की शुरुआत मिथुन संक्रांति से होती है। सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश करने के साथ ही इस पर्व का आरंभ माना जाता है। इसलिए ओडिशा में मिथुन संक्रांति केवल एक ज्योतिषीय घटना नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और लोकपर्व की शुरुआत भी मानी जाती है। यह एक ज्योतिषीय घटना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और लोकपर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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