वैशाली की भाषा-संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाएगा विद्यापति-डॉ सरिता बुद्धू
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। भारत के पड़ोसी देश नेपाल की राजधानी काठमांडू में बीते 9 से 12 अगस्त तक आयोजित वैशाली अंतर्राष्ट्रीय गौरव सम्मान समारोह में भाषा, साहित्य, पत्रकारिता, लेखन, संस्कृति और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लगभग 20 विशिष्ट सम्मानित जनों को सम्मानित किया गया।
इस अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन वैशाली अंतरराष्ट्रीय विद्यापीठ एवं मानवाधिकार टुडे के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। समारोह के दौरान इतिहास, साहित्य, लेखन और पत्रकारिता में बज्जिका मातृभाषा का योगदान: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य विषय पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी भी आयोजित की गयी।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार निर्पेंद्र लाल श्रेष्ठ ‘राजू’ मौजूद रहे। उनके साथ निर्पित श्रेष्ठ, सुरेंद्र श्रेष्ठ और संदीप श्रेष्ठ सहित नेपाल एवं भारत के विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य जन उपस्थित थे। मौके पर वैशाली अंतरराष्ट्रीय विद्यापीठ के संस्थापक एवं मानवाधिकार टुडे के संपादक डॉ शशि भूषण कुमार ने कहा कि सम्मान का मुख्य उद्देश्य मातृभाषा, संस्कृति और विरासत के संरक्षण में लगे गणमान्य जनों को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा और संस्कृति समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं, जिनके संरक्षण से भाईचारा, सद्भाव और बंधुत्व मजबूत होता है।
संस्था के संरक्षक पद्मश्री डॉ जे. के. सिंह ने भारत से भेजे अपने संदेश में कहा कि विभिन्न समुदायों की मातृभाषाओं और संस्कृतियों के संरक्षण के लिए चलाया जा रहा यह अभियान ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। कहा कि भाषाई विविधता का संरक्षण किसी एक समाज की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।

मॉरीशस से अंतरराष्ट्रीय संस्कृत संवर्धन से जुड़ी मॉरीशस के पूर्व उप प्रधानमंत्री की धर्मपत्नी अंतर्राष्ट्रीय दीदी डॉ सरिता बुद्धू ने अपने संदेश में कहा कि डॉ शशि भूषण कुमार ने वैशाली अंतरराष्ट्रीय विद्यापीठ की स्थापना कर वैशाली की मातृभाषा और संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। उन्होंने कहा कि यह अभियान दक्षिण एशियाई देशों से आगे दुनिया के लोकतांत्रिक देशों तक वैशाली की संस्कृति और विरासत का संदेश पहुंचाएगा।
समारोह में भारत और नेपाल सहित विभिन्न क्षेत्रों के पत्रकारों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा भाषा-संस्कृति से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में बज्जिका सहित भारतीय और नेपाली मातृ भाषाओं के संरक्षण, लेखन, साहित्य और पत्रकारिता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने पर विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन का संदेश यह रहा कि मातृभाषा बचेगी तो संस्कृति बचेगी। संस्कृति बचेगी तो इतिहास और मानवीय विरासत सुरक्षित रहेगी।
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