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कलयुग की कड़वी सच्चाई: बदलती प्राथमिकताओं के बीच रिश्तों और संस्कारों पर सवाल

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। बदलते समय के साथ जीवनशैली में भी तेजी से परिवर्तन आया है। आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसी बदलाव के बीच परिवार, संस्कार, रिश्ते और मानवीय संवेदनाओं को लेकर कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती भौतिक प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों को बनाए रखने की है।

आज की परिस्थितियों पर नजर डालें तो कई विरोधाभास दिखाई देते हैं। जूते शोरूम में और किताबें फुटपाथ पर। शराब दुकानों में आसानी से उपलब्ध और दूध के लिए जरूरतमंद परिवारों की परेशानी। कुत्ते महलों में और गायें सड़कों पर। बच्चे विदेश में और माता-पिता वृद्धाश्रम में। ये परिस्थितियां समाज की बदलती प्राथमिकताओं पर गंभीर चिंतन की जरूरत बताती हैं।

शिक्षा और संस्कारों को मिले प्राथमिकता। किताबें केवल कागज के पन्ने नहीं, बल्कि ज्ञान, विचार और संस्कार का माध्यम हैं। बच्चों और युवाओं में शिक्षा के साथ पुस्तकों के प्रति रुचि विकसित करना जरूरी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक तैयार करना भी होना चाहिए।

नशे की प्रवृत्ति समाज के लिए चिंता का विषय

शराब और अन्य नशीले पदार्थों की बढ़ती प्रवृत्ति परिवार और समाज दोनों के लिए चिंता का विषय है। वहीं दूसरी ओर कई जरूरतमंद परिवारों के लिए दूध जैसी आवश्यक वस्तु भी आर्थिक परेशानी का कारण बन जाती है। यह स्थिति समाज को अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने का संदेश देती है।

पशुओं के प्रति भी हो संवेदना

पालतू पशुओं के प्रति प्रेम अच्छी बात है, लेकिन सड़कों पर बेसहारा घूमने वाले पशुओं के प्रति भी समाज को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों के प्रति दया और करुणा को विशेष महत्व दिया गया है। जरूरत है कि यह भावना केवल परंपरा तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार में भी दिखाई दे।

माता-पिता का सम्मान सबसे बड़ी जिम्मेदारी

बच्चे विदेश में, मां-बाप वृद्धाश्रम में यह स्थिति आज सबसे अधिक सोचने को मजबूर करती है। बेहतर भविष्य के लिए बच्चों का दूसरे शहर या विदेश जाना गलत नहीं है, लेकिन माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी और भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना भी आवश्यक है। माता-पिता को केवल आर्थिक सहायता की जरूरत नहीं होती। उन्हें अपने बच्चों का समय, सम्मान, अपनापन और साथ भी चाहिए। जीवन की भागदौड़ में उनके साथ कुछ समय बिताना और उनकी भावनाओं को समझना भी संतान का महत्वपूर्ण दायित्व है।

बदलाव की शुरुआत परिवार से हो

समाज में सकारात्मक बदलाव केवल कानून या व्यवस्था से नहीं आएगा। इसकी शुरुआत प्रत्येक परिवार से करनी होगी। बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार, बुजुर्गों के प्रति सम्मान, जरूरतमंदों के प्रति संवेदना और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव सिखाना होगा। कलयुग की सबसे बड़ी चुनौती आधुनिकता नहीं, बल्कि आधुनिकता के बीच इंसानियत, संस्कार और रिश्तों को बचाए रखना है।

विकास तभी सार्थक होगा, जब सुविधाओं के साथ हमारे भीतर संवेदनाएं भी जीवित रहे। आज जरूरत है कि हम अपने बच्चों को केवल सफल बनने की शिक्षा न दें, बल्कि अच्छा इंसान बनने की सीख भी दें। क्योंकि, समाज की वास्तविक समृद्धि ऊंची इमारतों और बढ़ती सुविधाओं से नहीं, बल्कि मजबूत रिश्तों, अच्छे संस्कारों और मानवीय संवेदनाओं से तय होती है।

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