एस. पी. सक्सेना/पटना (बिहार)। विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर 27 मार्च को बिहार की राजधानी पटना के खेमनीचक में तुम कब जाओगे नाटक का मंचन किया गया।
जानकारी देते हुए कलाकार साझा संघ के सचिव सह प्रसिद्ध टीवी कलाकार मनीष महीवाल ने बताया कि विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर रंगवेदिका द्वारिका नगर रोड नंबर दो खेमनीचक में लोक पंच की नवीनतम प्रस्तुति नाटक तुम कब जाओगे का सफल मंचन किया गया, जिसका दर्शकों ने भरपूर आनंद लिया।
महीवाल के अनुसार उक्त नाटक मशहूर व्यंग्यकार शरद जोशी की लोकप्रिय रचना तुम कब जाओगे से प्रेरित है। कहा कि कहानी एक ऐसे अनचाहे मेहमान के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो बिना सूचना के एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार के घर आता है और फिर जाने का नाम ही नहीं लेता।
नाटक में दिखाया गया है कि शुरुआत में घरवाले भारतीय परंपरा के अनुसार पूरे दिल से बिन बुलाये अतिथि का स्वागत करते हैं। आदर-सत्कार, अपनापन और सहनशीलता सब कुछ दिखता है। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, वही मेहमान घर की लय बिगाड़ने लगता है। खर्च बढ़ता है, निजी जगह कम होती है और जीवन की सहजता धीरे-धीरे असहजता में बदल जाती है।
समस्या यह है कि मेज़बान खुलकर कुछ कह भी नहीं सकता, संस्कार और शिष्टाचार उसे रोकते हैं। बाहर से मुस्कान बनी रहती है, लेकिन भीतर सवाल लगातार गूंजता है कि आखिर ये जाएंगे कब? यही अंदरूनी संघर्ष हास्य, व्यंग्य और चुटीले संवादों के जरिए मंच पर बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। महीवाल ने बताया कि यह नाटक सिर्फ एक मेहमान की कहानी नहीं है, बल्कि उस सोच पर हल्का-सा तंज है, जहाँ अतिथि देवो भव कभी-कभी बोझ बन जाता है। साधारण-सी घरेलू स्थितियों के माध्यम से यह रचना रिश्तों की औपचारिकता, सामाजिक दबाव और इंसानी मन की उलझनों को बेहद प्रभावशाली तरीके से उजागर करती है।

मन में गुदगुदी समेटे मनोरंजन के साथ-साथ यह नाटक दर्शकों को एक जरूरी सवाल सोचने पर मजबूर करता है। परंपरा निभाना ज़रूरी है, लेकिन अपनी सीमाओं का सम्मान करना भी उतना ही अहम है। नाटक के मंच पर सोनू कुमार, सिमरन कुमारी, हिमांशु कुमार, अरबिंद, शिवम, अभिषेक आदि कलाकारों ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया, जबकि मंच से परे नैपथ्य में संगीत संचालन अजीत कुमार, प्रकाश राम प्रवेश, रूप सज्जा रोज सिंह, वस्त्र विन्यास रितिका, फोल्डर ज़फ़र आलम, मंच व्यवस्था देवयांक, प्रस्तुति नियंत्रक मनीष महिवाल ने नाटक के सफल मंचन में अहम योगदान दिया। नाटक का निर्देशन जहाँगीर ने किया, जबकि मूल कहानीकार शरद जोशी है।
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