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सवर्ण नहीं, सामान्य जाति आयोग हो नाम, यह सनातन परंपरा के अनुकूल-महेन्द्र प्रताप

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। बिहार के सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, अधिवक्ता व् चिंतक महेन्द्र प्रताप ने 4 अगस्त को एक भेंट में कहा कि राज्य सरकार द्वारा गठित सवर्ण आयोग का नाम बदलकर सामान्य जाति आयोग किया जाना चाहिए। सवर्ण या उच्च जाति जैसे शब्द सनातन परंपरा के प्रतिकूल और सामाजिक विषमता के द्योतक हैं।

उन्होंने कहा कि वैदिक काल की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था गुण और कर्म पर आधारित थी। कहा कि इंसान अपने स्वभाव के अनुसार वृत्ति चुनने को स्वतंत्र था। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागशः अर्थात गुण और कर्म के आधार पर चार वर्णों की सृष्टि हुई है।

वेद वचन है कि जन्मना जायते शूद्रः, संस्काराद् द्विज उच्यते यानी जन्म से सभी शूद्र और संस्कार से द्विज बनते हैं। सभी वर्ण एक-दूसरे के पूरक थे, ऊंच-नीच का भाव नहीं था। कहा कि वर्ण व्यवस्था से पहले आर्यावर्त में गोत्र व्यवस्था थी जो सप्तऋषियों से जुड़ी थी। सवर्ण का अर्थ है जो वर्ण के साथ हो। इस व्यवस्था में बिना वर्ण का कोई नहीं था। बिहार सरकार की जातीय गणना रिपोर्ट में भी सवर्ण की जगह सामान्य जाति शब्द का प्रयोग किया गया है, इसलिए आयोग का नाम भी सामान्य जाति आयोग होना श्रेयस्कर होगा।

सामाजिक चिंतक महेन्द्र प्रताप ने कहा कि सवर्ण आयोग के समक्ष चुनौती बड़ी है। जिस प्रकार काका कालेलकर, मुंगेरीलाल और मंडल आयोग की अनुशंसाओं पर पिछड़ी और अत्यंत पिछड़ी जातियों को मुख्यधारा में लाने के लिए योजनाएं बनीं, उसी प्रकार सामान्य वर्ग की जातियों के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन की तह तक जाना आयोग की वैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद सामान्य वर्ग की स्थिति लगातार खराब हुई है। वे कृषि भूमि बेचकर शिक्षा और सामाजिक जरूरतें पूरी करते रहे और आज अधिकांश फटेहाली में जीने को विवश हैं।

महंगी शिक्षा उनकी पहुंच से दूर हो रही है। बिहार की राजधानी पटना के चौक-चौराहों पर लगने वाले मजदूरों के जमावड़े में भी जनसंख्या अनुपात में सामान्य वर्ग की भागीदारी अधिक दिखती है। नालंदा और मधेपुरा जैसे जिलों में भी सामाजिक-आर्थिक बादशाहत सामान्य जातियों की नहीं है, फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिला।

उन्होंने कहा कि पांच प्रतिशत की चमक-दमक के पीछे पंचानवे प्रतिशत सामान्य वर्ग की कड़वी सच्चाई छिप जाती है। वहीं जाति सूचक शब्दों के दुरुपयोग से जुड़े एकतरफा कानूनों के झूठे मुकदमों में भी सामान्य वर्ग के प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं, जो नैसर्गिक न्याय के प्रतिकूल है।

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