एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। घासी समाज को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा मिले, ताकि आजाद भारत मे किए गए ऐतिहासिक अन्याय का अंत हो सके।
इस आशय से संबंधित आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक प्रत्याशी विजय शंकर नायक ने घासी समाज के लाखों सदस्यों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री, झारखंड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जनजातीय मंत्री चमरा लिंडा, मुख्य सचिव झारखंड, एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के निदेशक, जनजातीय कार्य मंत्रालय के सचिव एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को ईमेल पत्र भेजा।
नायक द्वारा प्रेषित पत्र में घासी समाज को अनुसूचित जनजाति (एसटी) सूची में पुनः शामिल करने की दिशा में तत्काल कार्रवाई की मांग की गई है। कहा गया कि घासी समाज छोटानागपुर पठार (झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा एवं बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों) का मूल समुदाय है। मुंडारी भाषा बोलने वाला यह समाज सरना धर्म (प्रकृति पूजा, सिंगबोंगा देवता), सरहुल-करम त्योहार एवं जंगल-आधारित जीवनशैली (घास काटना, चटाई निर्माण, ढोल बजाना) अपनाता है। ब्रिटिश काल में primitive tribe/aboriginal race के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद, क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1871) के तहत क्रिमिनल ट्राइब का लेबल लगा।
देश की स्वतंत्रता के बाद 1950 के संविधान (एससी/एसटी) आदेश में बिना कारण अनुसूचित जाति (एससी) में डाल दिया गया, जो डॉ अंबेडकर के निर्धारित मानदंडों का उल्लंघन था। इससे सांस्कृतिक पहचान नष्ट हुई और घासी समाज एसटी सुविधाओं से वंचित रह गया।
ऐतिहासिक साक्ष्य: जनजातीय पहचान की पुष्टि
नायक ने ब्रिटिश दस्तावेजों का हवाला देते हुए लोकुर समिति (1965) के एसटी मानदंडों (सांस्कृतिक विशिष्टता, भौगोलिक अलगाव, पिछड़ापन, मुख्यधारा से अलगाव) से पूर्ण मेल पर जोर दिया। प्रमुख साक्ष्य*:
| वर्ष/स्रोत | विवरण | प्रमुख तथ्य |
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| **1891: The Tribes and Castes of Bengal (H.H. Risley)** | घासी *को “primitive tribe” एवं द्रविड़-कोलारियन मूल का आदिवासी कहा। | सामूहिक भूमि स्वामित्व, मुंडा-उरांव जैसी रीति-रिवाज*। *1901: बंगाल जनगणना (रांची उपायुक्त H.C. Streatfeild) *43 जनजातियों में क्र. 16 पर घासी चिह्नित। पत्र संख्या 265C, 1 अक्टूबर 1901*
*1911: Census of India, Vol. V** *आदिवासी श्रेणी में जनसंख्या, वितरण (रांची, सिंहभूम, संथाल परगना) वर्णन। प्रथागत प्रथाओं का उल्लेख*।
*1913: भारत गजट अधिसूचना (गृह विभाग, शिमला)* *मुंडा, उरांव आदि के साथ सूचीबद्ध; उत्तराधिकार अधिनियम 1865 से बाहर। संख्या 18, 2 मई 1913 *।
*1931: Census of India, Bihar & Orissa* *Semi-Hinduised aboriginal के रूप में वर्गीकृत। जनजाति सूची में शामिल*। *1936: पिछड़ा वर्गीकरण**
*छोटानागपुर में “Backward Tribe; पटना में SC। क्षेत्रीय भेदभाव दर्शाता*। *1941: Census of India, Vol. IV (Bihar)** *Other Primitive Tribes” श्रेणी। पारंपरिक व्यवसाय व जीवनशैली का उल्लेख*। *1961: Land and People of Tribal Bihar (N. Prasad)** *जनजातीय प्रथाएं (संगीत, मिलिशिया, जंगली संसाधन) वर्णित। आदिवासी संस्कृति की पुष्टि* तमाम साक्ष्य स्पष्ट करते हैं कि स्वतंत्रता पूर्व घासी को एसटी के रूप में मान्यता थी।
नायक ने मंच की पूर्व अपील (2024 में PM को पत्र) का जिक्र करते हुए कहा कि, हम न्याय की प्रतीक्षा नहीं कर सकते। प्रमुख मांगो मे राज्य स्तर पर झारखंड सरकार ऐतिहासिक दस्तावेज (Risley, Dalton), ANSI सांस्कृतिक सर्वे एवं सामाजिक-आर्थिक डेटा सहित प्रस्ताव जनजातीय मंत्रालय को भेजे।
केंद्रीय स्तर पर जनजातीय मंत्रालय RGI, NCST से जांच करवाए; ANSI से आदिवासी पहचान की पुष्टि। समयसीमा 3 माह में प्रस्ताव तैयार; 6 माह में संसदीय संशोधन विधेयक। सुनवाई में NCST में घासी प्रतिनिधियों को अवसर। समीक्षा RGI द्वारा लोकुर मानदंडों पर पात्रता मूल्यांकन; 1950 आदेश में संशोधन प्रक्रिया शुरू। नायक के अनुसार यदि मांग की अनदेखी की गयी तो घासी समाज संवैधानिक प्रक्रिया अपनाते हुए शांतिपूर्ण आंदोलन तेज करेगा। ऐतिहासिक अन्याय की जिम्मेदारी केंद्र व् राज्य सरकारों पर होगी।
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