अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में हरिहरक्षेत्र श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम दिव्य देश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने चातुर्मास की पूर्व संध्या पर 24 जुलाई को हरिशयनी एकादशी एवं चातुर्मास की महत्ता बताते हुए कहा कि यह चार मास वाह्य नहीं, आंतरिक शुद्धि का समय है।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की गौरवशाली परंपरा में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी अथवा हरिशयनी एकादशी के रूप में परम पावन माना गया है। कहा कि 25 जुलाई को इस महापर्व के साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ हो रहा है, जो अगले चार माह तक आध्यात्मिक संयम, साधना और आत्म-चिंतन का दिव्य अवसर प्रदान करेगा।
श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम् दिव्य देश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने बताया कि हरिशयनी एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु के क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन होने का दिन है। आज से भगवान चार मास के लिए योगनिद्रा में जाएंगे और कार्तिक शुक्ल एकादशी, देवोत्थानी एकादशी को जागृत होंगे। दार्शनिक दृष्टि से इसी को हरिशयन’ कहा गया है।
स्वामीजी ने कहा कि यह काल केवल धार्मिक अनुष्ठान का नहीं, बल्कि आत्म-जागरण का है। उन्होंने कहा कि यह काल वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों में सूर्य और चंद्रमा का तेज क्षीण हो जाता है, जिससे मानव शरीर की पाचन शक्ति मंद पड़ती है और संक्रामक रोगों का प्रसार बढ़ जाता है। इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों और पूर्वजों ने इस अवधि में बाहरी भौतिक गतिविधियों को सीमित कर आंतरिक शुद्धि, सात्विक आहार और संयमित जीवन पर विशेष बल दिया है।
चातुर्मास का वास्तविक अर्थ : आत्म-अनुशासन
चातुर्मास के मर्म को स्पष्ट करते हुए स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि चातुर्मास का वास्तविक अर्थ है स्वयं को अनुशासित करना। इस काल में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक संस्कार वर्जित होते हैं, ताकि मनुष्य बाह्य आडंबर से हटकर आत्म-चिंतन, जप, तप, दान और भक्ति में स्थित हो सके। कहा कि यह समय हमें सिखाता है कि जीवन की निरंतर भौतिक भागदौड़ से क्षण भर रुक कर ईश्वर के सानिध्य में कैसे स्थिर हुआ जाए। जो भक्त नियमपूर्वक इस दौरान पूजा, व्रत और सेवा का पालन करते हैं, वे ज्ञात-अज्ञात पापों से मुक्त होकर मानसिक शांति और मनोवांछित फल को प्राप्त करते हैं।
स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने बताया कि एकादशी तिथि उदय तिथि के मान से पूर्णतः मान्य है। व्रती जनों के लिए व्रत का पारण 26 जुलाई को प्रातः 5:39 से 8:22 बजे के मध्य करना श्रेयस्कर रहेगा। अंत में स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने आह्वान किया कि इस चातुर्मास में हम सभी सादगी और सेवा के संकल्प के साथ अपने अंतःकरण को पवित्र करें। भगवान विष्णु की असीम कृपा से यह अवधि सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार करे।
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