राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता किसान जितेंद्र कुमार सिंह की सरकार से मांग
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। वर्तमान में वैश्विक चुनौती, बदलते मौसम, गहराते जल संकट और कुपोषण की चुनौतियों के बीच श्रीअन्न (मोटे अनाज) को जन-आंदोलन बनाने के लिए अब सरकारी तंत्र को आगे आना होगा।
श्रीअन्न के वैज्ञानिक और व्यावहारिक महत्व पर देश में पहली बार चार प्रामाणिक पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन करने वाले वरिष्ठ विशेषज्ञ व राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किसान जितेंद्र कुमार सिंह ने 8 जून को राज्य सरकार और कृषि विभाग से इन पुस्तकों को सरकारी स्तर पर प्रमोट करने की पुरजोर मांग की है।
पुस्तकों के लेखक जितेंद्र सिंह का स्पष्ट कहना है कि नीतियां सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर तब उतरेंगी, जब खेतों में काम करने वाले कृषि अधिकारियों और जमीनी प्रसार कर्मियों के पास सही, सटीक और व्यावहारिक ज्ञान होगा। उन्होंने ठोस सुझाव देते हुए राज्य सरकार के समक्ष मांग रखी है कि सरकार उपरोक्त चारों अनमोल पुस्तकों को कृषि और उससे जुड़े अन्य संबंधित विभागों में अनिवार्य रूप से वितरित करे। राज्य के सभी जिला कृषि कार्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि समन्वयकों और किसान सलाहकारों को पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएं, ताकि वे किसानों का सही मार्गदर्शन कर सकें। इन पुस्तकों को केवल कृषि तक सीमित न रखकर शिक्षा विभाग (मिड-डे मील योजना हेतु) तथा महिला एवं बाल विकास विभाग (आंगनबाड़ी व जीविका/स्वयं सहायता समूहों हेतु) में भी वितरित किया जाए।
उन्होंने राज्य सरकार से कहा है कि राज्य में आयोजित होने वाले कृषि मेलों, प्रदर्शनियों और मिलेट महोत्सवों में ऐसे पुस्तकों के प्रदर्शन और बिक्री के लिए विशेष स्टॉल की व्यवस्था की जाए। विदित हो कि जितेंद्र सिंह द्वारा लिखित उपरोक्त पुस्तकें मिट्टी से लेकर इंसानी सेहत तक के सफर को बेहद सरल भाषा में समझाती हैं जिनमें मोटा अनाज – सेहत का खजाना, पोषण और ऊर्जा का स्रोत – मोटा अनाज, श्रीअन्न – प्रकृति का अनमोल उपहार, श्रीअन्न – स्वाद और सेहत का संतुलन (मिट्टी से महाशक्ति तक श्रीअन्न की वापसी) शामिल है।
उन्होंने कहा कि श्रीअन्न जनता और पर्यावरण के लिए कम खर्च में महा-क्रांति जैसा है। उन्होंने कहा कि श्रीअन्न (ज्वार, बाजरा, रागी, सावां, कोदो आदि) की खेती आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत क्यों है? क्योंकि इससे जल की भारी बचत होती है। धान और गेहूं के मुकाबले श्रीअन्न की खेती में मात्र एक-चौथाई (25 प्रतिशत) पानी की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा इसमें रासायनिक खादों और कीटनाशी दवाओं की जरूरत न के बराबर होती है, जिससे लागत घटती है। यह मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ-साथ, मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

उन्होंने सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है कि मैंने कर्तव्य निभाया, अब सरकार की बारी है। एक किसान और शोधकर्ता के रूप में मैंने सालों की मेहनत के बाद अपना कर्तव्य पूरा करते हुए समाज को ये चार पुस्तकें सौंपी हैं। अब राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस व्यावहारिक ज्ञान को अपनी प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनाए, ताकि कम लागत में हमारे देश का किसान खुशहाल, आत्मनिर्भर और सेहतमंद बन सके।
सच कहिए तो यह मांग देश के तमाम किसानों की है, जिसे मजबूती से पहली बार उठाया गया है। यह मांग सरकार को मिलेट मिशन को सफल बनाने का एक रेडीमेड ब्लूप्रिंट भी देता है। साथ ही, आम जनता को मोटे अनाज के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य लाभों से सीधे जोड़ता है।
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