एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। केंद्र सरकार द्वारा संसद में पारित कराए गए खनिज खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन (एमएमडीआर) संशोधन अधिनियम 2026 के विरोध में 17 अगस्त को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के संयुक्त बैनर तले झारखंड की राजधानी रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर विशाल विरोध प्रदर्शन एवं पुतला दहन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
इस अवसर पर हजारों की संख्या में जुटे वाम दलों के कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह का पुतला फूंककर काला कानून वापस लो, जल-जंगल-जमीन बचाओ और कॉरपोरेट का दलाल, मोदी सरकार के नारे लगाए।
इस अवसर पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए भाकपा प्रदेश सचिव महेन्द्र पाठक ने कहा कि यह संशोधन विधेयक झारखंड के अस्तित्व पर सीधा हमला है। केंद्र सरकार पूंजीपतियों के दबाव में आकर आदिवासी-मूलवासी के संवैधानिक अधिकारों को बेचना चाहती है। दलित अधिकार मंच के अध्यक्ष भंते जैनेंद्र तथागत ने कहा कि इस कानून से किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान के वेलफेयर में काफी नुकसान होगा। शेष लगाने का अधिकार समाप्त कर केंद्र सरकार ने झारखंड के साथ सौतेला व्यवहार किया है
सभा को संबोधित करते हुए भाकपा-माले राज्य सचिव अनीता भट्टाचार्य ने कहा कि यह कानून खनिजों के राष्ट्रीयकरण के सिद्धांत को खत्म कर देगा और सारी खदानें 2-3 कॉरपोरेट घरानों को सौंप दी जाएंगी।
सीपीएम नेता प्रफुल्ल लिंडा ने कहा कि झारखंड खनिज संपदा से भरा राज्य है। इस कानून से यहां का विस्थापन 10 गुना बढ़ जाएगा। ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन राज्य सचिव विक्रम कुमार ने कहा कि विधेयक से सीधे सीधे केंद्र सरकार यहाँ के खान खनिज पूंजीपतियों के हांथो मे सौपना चाहता है, जो झारखंड के छात्र नौजावानो को मंजूर नहीं है।
वक्ताओं ने 4 बिंदुओं पर विस्तार से आपत्ति दर्ज कराई जिसमें कहा गया कि एमएमडीआर सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का उल्लंघन है। कहा गया कि 25 जुलाई 2024 को 9 जजों की संविधान पीठ ने जमीन जिसकी, खदानें उसकी का ऐतिहासिक फैसला दिया था। साथ ही कहा था कि राज्य सरकारें खनिजों पर टैक्स लगा सकती हैं। यह नया संशोधन उस फैसले को पलटकर केंद्र को सारे अधिकार दे रहा है। यह न्यायपालिका की अवमानना है।
कहा गया कि पांचवी अनुसूची एवं पेसा कानून पर हमला है। झारखंड का 90 प्रतिशत क्षेत्र पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है। यहां किसी भी खनन परियोजना के लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति जरूरी है। यह कानून ग्राम सभा की शक्ति को निष्प्रभावी कर सीधे कॉरपोरेट को लीज देगा। यह सरना धर्म, संस्कृति और स्वशासन पर हमला है।
कहा गया कि राज्य के अधिकारों की लूट है। खनिज रॉयल्टी और डीएमएफ फंड राज्य का अधिकार है। इस संशोधन से केंद्र उन पैसों को भी अपने पास रख लेगा। इससे झारखंड आर्थिक रूप से और कमजोर होगा। तथा पर्यावरण एवं विस्थापन का संकट बढ़ेगा। कहा गया कि इस कानून में पर्यावरणीय मंजूरी और विस्थापन कानून को ढीला किया गया है। इससे जंगल कटेंगे, नदियां प्रदूषित होंगी और लाखों झारखंडवासी बेघर होंगे।
उपस्थित वाम दलों के नेताओं ने मांग की कि राष्ट्रपति इस विधेयक को तुरंत पुनर्विचार के लिए संसद की स्थायी समिति को भेजें। झारखंड सरकार केंद्र पर दबाव बनाकर इस कानून को झारखंड में लागू न होने दे। यदि 15 दिनों के अंदर सरकार पीछे नहीं हटती तो वाम दल मिलकर पूरे राज्य में चक्का जाम और राजभवन घेराव करेंगे।
सभा तथा पुतला दहन कार्यक्रम में भाकपा प्रदेश सचिव महेन्द्र पाठक, अध्यक्ष दलित अधिकार मंच भंते जैनेंद्र तथागत, दलित अधिकार मंच प्रदेश संयोजक राजकुमार दास, सेवानिवृत प्रधान शिक्षक अली अंसारी, इश्क अंसारी, मुकेश कुमार, अखिलेश सिंह, विक्रम कुमार सिंह, आदिल खान, मनोज ठाकुर, श्यामल चक्रवर्ती, विजय सिंह, गुरु प्रसाद, चंदेश्वर प्रसाद सिंह, छुमो उरांव, भाकपा-माले से राज्य सचिव अनीता भट्टाचार्य, मनोज भट्ट, शुभेंदु सेन, सीपीएम से प्रफुल्ल लिंडा, वीरेंद्र कुमार, प्रतीक मिश्रा सहित तीनों पार्टियों के सैकड़ों कार्यकर्ता एवं आदिवासी-मूलवासी संगठन के नेतागण उपस्थित थे।
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