रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। भारतीय सनातन संस्कृति में आदिशक्ति की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। माँ दुर्गा, माँ काली, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती की तरह ही माँ तारा भी शक्ति की एक अत्यंत दिव्य एवं प्रभावशाली स्वरूप हैं। वे हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या मानी जाती हैं।
तारा शब्द संस्कृत धातु तृ से बना है, जिसका अर्थ है पार लगाना या उद्धार करना। इसलिए माँ तारा को ऐसी देवी माना जाता है जो अपने भक्तों को भय, दु:ख, संकट, अज्ञान और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष का मार्ग दिखाती हैं।
माँ तारा को करुणा, ज्ञान, मातृत्व, संरक्षण और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। उनका स्वरूप जितना उग्र दिखाई देता है, उतना ही वे अपने भक्तों के लिए वात्सल्य और दया की मूर्ति हैं। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु उन्हें अपनी आराध्य देवी मानकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।
माँ तारा का पौराणिक स्वरूप
हिन्दू धर्म शास्त्रों में माँ तारा का वर्ण गहरे नीले अथवा श्याम रंग का बताया गया है। वे चार भुजाओं वाली हैं। उनके हाथों में खड्ग, कमल, कपाल और कैंची या अन्य आयुध दर्शाए जाते हैं। गले में मुंडमाला, कमर में बाघ की खाल और मुख पर अद्भुत तेज उनकी दिव्य शक्ति का प्रतीक है। माँ तारा का एक अत्यंत प्रसिद्ध स्वरूप वह है जिसमें वे भगवान शिव को अपनी गोद में लेकर उन्हें स्तनपान करा रही हैं। यह दृश्य केवल मातृत्व का ही नहीं, बल्कि यह संदेश भी देता है कि समस्त ब्रह्मांड की मूल शक्ति आदिशक्ति ही हैं। शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
पुराणों के अनुसार जब देवताओं और दानवों द्वारा समुद्र मंथन किया गया तो सबसे पहले कालकूट (हलाहल) विष निकला। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया। विष की तीव्र ज्वाला से उनका शरीर जलने लगा। तब आदिशक्ति ने माँ तारा का रूप धारण किया। शिव को अपनी गोद में लिया और उन्हें अमृत तुल्य स्तनपान कराया। इससे विष की ज्वाला शांत हो गई। इसीलिए माँ तारा को करुणा, ममता और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
पश्चिम बंगाल में शक्तिस्थल तारापीठ का महत्व
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ भारत के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। यह स्थान केवल मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और तांत्रिक साधना का महान केंद्र है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में योगाग्नि द्वारा देह त्याग दी, तब भगवान शिव उनका शरीर लेकर तांडव करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को छिन्न-भिन्न (अलग) कर दिया। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। मान्यता है कि तारापीठ में माता सती का नेत्र (आंख) या नेत्रांश गिरा था। इसी कारण इस स्थान का नाम तारापीठ पड़ा और यह शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र बन गया।
तारापीठ का महाश्मशान पूरे भारत में तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ की साधना शीघ्र सिद्धि प्रदान करती है। अनेक सिद्ध पुरुषों और संतों ने यहाँ वर्षों तक तपस्या की। इनमें सबसे प्रसिद्ध नाम महासाधक बामाखेपा का है। वे माँ तारा के ऐसे अनन्य भक्त थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन माता की भक्ति में समर्पित कर दिया। कहा जाता है कि माँ तारा उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देती थीं और पुत्र की भाँति स्नेह करती थी। आज भी उनकी समाधि श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
ज्ञात हो कि, माँ तारा की उपासना केवल सांसारिक सुख प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति के लिए भी की जाती है। भक्तों का विश्वास है कि उनकी कृपा से जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर होते हैं। भय, रोग और शत्रुओं से रक्षा होती है। ज्ञान, विवेक और आत्मबल की प्राप्ति होती है। परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। संतान प्राप्ति और स्वास्थ्य संबंधी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है। आध्यात्मिक साधना में सफलता प्राप्त होती है। मन को शांति और जीवन को सही दिशा मिलती है।
जानकारी के अनुसार तारापीठ में वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, लेकिन विशेष रूप से नवरात्रि, काली पूजा, अमावस्या, गुरु पूर्णिमा, दीपावली के अवसर पर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। इन दिनों मंदिर परिसर में विशेष पूजा, हवन, भजन-कीर्तन और तांत्रिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
सार यह कि, माँ तारा का स्वरूप हमें यह शिक्षा देता है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल पराक्रम नहीं, बल्कि करुणा, सेवा, ज्ञान और संरक्षण भी है। जो व्यक्ति सच्चे मन से उनकी आराधना करता है, उसके जीवन में आशा, साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है। वे अपने भक्तों को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। आज के समय में, जब मनुष्य तनाव, भय और असुरक्षा से घिरा है, माँ तारा की उपासना आत्मबल, मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करने का माध्यम बन सकती है। इसलिए तारापीठ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि श्रद्धा, साधना, विश्वास और दिव्य शक्ति का ऐसा तीर्थ है, जहाँ पहुँचकर हर भक्त स्वयं को माँ की असीम कृपा से अभिभूत महसूस करता है। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
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