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कमाई में सबका हिस्सा निकालकर खाएंगे तो पाप खाना पड़ेगा-रामानुजाचार्य

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। तिरहुत प्रमंडल के हद में मुजफ्फरपुर के फिरोजपुर सकरा में चल रहे साप्ताहिक श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन 5 जून को श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

इस पावन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सारण जिला के हद में हरिहरक्षेत्र सोनपुर के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने दान की महिमा का विस्तृत वर्णन किया। कहा कि ​दानं दुर्गति नाशनम्: कलयुग में दान ही सर्वोत्तम माध्यम स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने शास्त्रों का संदर्भ देते हुए कहा कि “दानं दुर्गति नाशनम्” अर्थात दान करने से मनुष्य की दुर्गति का विनाश होता है, इसलिए दान सभी को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दानमेकं कलौयुगे अर्थात कलयुग में दान की बहुत बड़ी महिमा है।

दान न करने वाला मनुष्य दरिद्र होता है। वह दरिद्रता के कारण नाना प्रकार के पाप कर्मों में लिप्त हो जाता है और अगले जन्म में पुनः दरिद्र रूप में ही जन्म लेता है। इसके विपरीत, सत्पात्र (योग्य व्यक्ति) को दान देने वाला मनुष्य धनी बनता है और पुनः उस धन से दान करता है। धर्म के मार्ग पर चलने से अंततः उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यदि किसी कारणवश मोक्ष न भी मिले, तो वह किसी उच्च या राजकुल में जन्म लेता है। दान करने वाले की कभी अधोगति नहीं होती।

​भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का प्रसंग सुनाते हुए स्वामीजी ने कहा कि नंद बाबा ने कृष्ण जन्म के उपलक्ष्य में मुक्त हस्त से दान किया था। ​कमाई का सर्वग्रास करने का अधिकार किसी को नहीं ​मनुष्य की प्रवृत्ति पर प्रहार करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि अपनी कमाई का सर्वग्रास (अकेले उपभोग) करने का अधिकार किसी को नहीं है। आपकी कमाई में धर्म, माता-पिता, पशु-पक्षियों और जरूरतमंदों का भी अधिकार है।

कहा कि यदि आप सबके हिस्से का अंश अकेले खाएंगे, तो आपको पाप भी खाना पड़ेगा। इसलिए अपनी कमाई में से सबका हिस्सा निकालकर ही ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार के सभी मजहबों में दान की व्यवस्था है, बिना दान के कोई भी चैरिटी संस्था नहीं चल सकती।

बाजार में नहीं, सत्संग और बुजुर्गों की सेवा से मिलते हैं संस्कार

​कथा के दौरान भगवान के जातकर्म एवं नामकरण संस्कार के प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि मानव जीवन में सोलह प्रकार के संस्कार बताए गए हैं, लेकिन आज हम अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ​संस्कार किसी हाट-बाजार या महानगरों में बिकने वाली वस्तु नहीं है। इसे केवल सत्संग, संतों के प्रवचन और घर के बड़े-बुजुर्गों की सेवा से ही प्राप्त किया जा सकता है। संस्कारहीन मनुष्य साक्षात पशु के समान हो जाता है।

​कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भव्य गोवर्धन लीला एवं रासलीला के दर्शन किए। पांचवें दिन के सत्र के अंत में माता रुक्मिणी के संग भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य जयमाल (विवाह उत्सव) का आयोजन किया गया। इस अलौकिक प्रसंग और झांकी को देखने के लिए आसपास के गांवों से श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ पड़ा।

​इस भव्य ज्ञानयज्ञ के सफल आयोजन में मुख्य आयोजक वरुण कुमार सिंह, अमरेश सिंह एवं उनके सभी सहयोगी व्यवस्था संचालन में मुस्तैदी से तत्पर रहे। यज्ञ समिति द्वारा कथा में आने-जाने वाले सभी भक्तों के लिए भोजन एवं प्रसाद की उत्तम व्यवस्था की गई है। आयोजकों के अनुसार यह आध्यात्मिक कार्यक्रम आगामी 7 जून तक अनवरत चलेगा।

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