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गंगा दशहरा पर श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी व् हरिहरनाथ तथा पतालेश्वर नाथ का जलाभिषेक

 अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। अध्यात्म, संस्कृति एवं अनन्य आस्था की प्रदायिनी मां गंगा के पावन अवतरण दिवस गंगा दशहरा के पावन अवसर पर 26 मई को सारण जिला के हद में सोनपुर के विश्व विख्यात ऐतिहासिक बाबा हरिहरनाथ मंदिर और समीपवर्ती पवित्र घाटों पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी और उमस पर भक्तों की अटूट श्रद्धा भारी नजर आई।

इस अवसर पर ​दूर-दराज से आए शिव-शक्ति के उपासकों ने बाबा हरिहरनाथ सोनपुर एवं निकटवर्ती वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर नगर स्थित बाबा पतालेश्वर नाथ के दर्शन से पूर्व पहलेजा घाट स्थित दक्षिण वाहिनी गंगा और हाजीपुर में कौनहारा घाट पर दक्षिण वाहिनी नारायणी नदी की पवित्र धारा में आस्था की डुबकी लगाई।

सूर्य की पहली किरण के साथ ही गंगा व् नारायणी नदी घाट हर-हर गंगे और बाबा हरिहरनाथ एवं बाबा पतालेश्वर नाथ की जय उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। स्नान और ध्यान के पश्चात भक्तों ने देवाधिदेव महादेव के दरबार में पहुँचकर पारंपरिक रूप से जलाभिषेक किया और सुख, समृद्धि तथा आरोग्यता की कामना की।

पापविनाशिनी और मोक्षदायिनी हैं माँ गंगा

धर्म ​शास्त्रों में गंगा दशहरा के आध्यात्मिक महत्व को सर्वोपरि माना गया है। आदि शंकराचार्य कृत गंगा स्तोत्र की यह पंक्तियां मां गंगा की महिमा को साक्षात् परिभाषित करती है कि देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरल तरंगे।
शंकर मौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले।
​सनातन परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष दशमी के दिन गंगा नदी में स्नान, ध्यान और अर्चन करने से दस प्रकार के कायिक, वाचिक और मानसिक पापों का शमन होता है। इस दिन दान-पुण्य और दीपदान करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस महापुण्य काल में सनातन धर्मावलंबी मां गंगा, भगवान विष्णु और देवाधिदेव महादेव का संपूर्ण श्रद्धाभाव से पूजन-वंदन करते हैं।

भगीरथ की तपस्या और गंगा का धरा-अवतरण

सनातन धर्म ग्रंथ ​वाल्मीकिकृत रामायण, श्रीमद्भागवत पुराण और देवी भागवत के अनुसार गंगा दशहरा वही पावन तिथि है जब मां गंगा भगवान विष्णु के चरणों से निकलकर, राजा भगीरथ की कठोर तपस्या के फलस्वरूप पृथ्वी पर अवतरित हुईं। ​पौराणिक कथा के अनुसार सूर्यवंशी राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि के शाप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके प्रपौत्र राजा भगीरथ ने घोर तपस्या की थी। मां गंगा पृथ्वी पर आने को तैयार हुईं, परंतु उनके तीव्र वेग से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर लिया। तत्पश्चात, शिव की जटाओं से निकलकर गंगा सात धाराओं में प्रवाहित हुईं और भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर पाताल लोक पहुंची, जिससे सगर के पुत्रों का उद्धार और मोक्ष संभव हो सका।

​भीषण गर्मी के बीच हरिहर नाथ मंदिर न्यास की व्यवस्था सराहनीय रहा। बीते ​25 मई से शुरू होकर 26 मई गंगा दशहरा के मुख्य पर्व तक बाबा हरिहरनाथ मंदिर न्यास समिति, स्थानीय अर्चकों, पुजारियों और पंडा समाज द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक एवं अभूतपूर्व प्रबंध किए गए, जिसमें शीतल पेयजल और शरबत वितरण किया गया।

चिलचिलाती धूप और लू से भक्तों को बचाने के लिए पूरे परिसर में जगह-जगह वाटर कूलर लगाए गए थे। साथ ही नींबू, चीनी और रसना के ठंडे शरबत का निरंतर वितरण किया गया था।​छायादार वॉटरप्रूफ शेड की व्यवस्था की गई। कतारों में खड़े श्रद्धालुओं को कड़ी धूप से बचाने के लिए बांस-बल्ली और तिरपाल की सहायता से विशाल वॉटरप्रूफ पंडाल व शेड का निर्माण किया गया था।​ डिहाइड्रेशन, चक्कर आने या गर्मी जनित किसी भी स्वास्थ्य समस्या से निपटने के लिए मंदिर परिसर में विशेष चिकित्सा दल (मेडिकल टीम) चौबीसों घंटे मुस्तैद रहा है। श्रद्धा, सेवा और समर्पण के इस अद्भुत समागम के साथ हरिहरक्षेत्र में दो दिवसीय गंगा दशहरा महापर्व हर्षोल्लास और आध्यात्मिक चेतना के साथ संपन्न हो गया।

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