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मन विचलित है, समाज स्तब्ध है, आखिर कमी कहाँ रह गई-दीपेश निराला

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। ​पिछले कुछ समय में झारखंड की राजधानी रांची में हुए चार संदिग्ध और हृदयविदारक घटनाक्रमों ने मन को पूरी तरह से झकझोर दिया है। यह घटना भविष्य को लेकर एक गहरी चिंता पैदा कर दी है। उक्त उदगार हमर अधिकार मंच, रांची सिटीजन फोरम, ऑल इंडिया लॉयर्स फोरम तथा फेडरेशन ऑफ ऑल व्यापार संगठन के अध्यक्ष दीपेश निराला ने 22 मई को व्यक्त किया।

निराला के अनुसार राजधानी रांची के ​अपर बाजार (शीतल अपार्टमेंट) की स्व. आकांक्षा सिंघानिया की मौत, ​कोतवाली थाना क्षेत्र के ही स्व. मनीष धानुका की मृत्यु, ​ब्लेयर अपार्टमेंट के स्व. अनुराग सरावगी की मृत्यु ​और अब, कावेरी तथा कैपिटल हिल से जुड़े स्व. लव भाटिया की संदिग्ध मौत ने उन्हें झंझोर दिया है।

उन्होंने कहा कि ​अगर उपरोक्त चारों ही मामलों का गहराई से विश्लेषण करें, तो कुछ बातें स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आती है कि ​चारों मृतक आर्थिक रूप से बेहद सुदृढ़ और संपन्न थे। ​चारों का ताल्लुक रांची के प्रतिष्ठित और बड़े व्यापारी परिवारों से था। ​चारों शादीशुदा थे, सबका भरा-पूरा परिवार था। ​चारों के छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिनका भविष्य अब एक झटके में बदल गया है।

निराला ने कहा कि सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यह है कि जब जीवन में सब कुछ मौजूद था, जिसे बाहरी दुनिया सफलता और सुख का पैमाना मानती है। फिर ऐसी क्या कमी रह गई कि हँसती-खेलती जिंदगी इस प्रकार एक झटके में समाप्त हो जा रही है? निराला ने कहा कि ​भौतिक सुख-सुविधाओं, सामाजिक प्रतिष्ठा और ऊंचे रसूख के बीच आखिर ऐसा कौन सा खालीपन या मौन तनाव था, जो उपरोक्त चारो प्रतिष्ठित जनों पर इस कदर हावी हो गया। ​हमारा समाज इस सब से क्या सीख पायेगा?

उन्होंने कहा कि ​इन त्रासदियों से हमें यह कड़ा सबक लेना होगा कि बैंक बैलेंस और व्यावसायिक सफलता कभी भी आंतरिक शांति की गारंटी नहीं हो सकता। हमें अपने परिवार और मित्रों के बीच एक ऐसा संवाद जिंदा करना होगा, जहाँ कोई भी, चाहे वह कितना भी बड़ा कारोबारी क्यों न हो, अपनी कमजोरी, अपना डर या अपना तनाव बिना किसी झिझक के साझा कर सके। कहा कि हमें चेहरों के पीछे छिपे मौन को पढ़ना सीखना होगा।

​उन्होंने कहा कि इस पूरी परिस्थिति का सबसे दर्दनाक और गंभीर पहलू है। जिन बच्चों के सिर से अचानक इस तरह साया उठ गया, उनके कोमल मन पर जो आघात लगा है, उसकी भरपाई नामुमकिन है। वे समाज, सुरक्षा और खुद जीवन के प्रति एक गहरे संशय के साथ बड़े होंगे। यह हमारी और पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि हम सामूहिक रूप से आगे आएं, ऐसे परिवारों को संबल दें और आने वाली पीढ़ी को यह सिखाएं कि जीवन में हारना या कमजोर पड़ना सामान्य है, लेकिन जिंदगी से हार मान लेना कोई विकल्प नहीं है।

निराला ने कहा कि ​अब समय आ गया है कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग, व्यावसायिक संगठन और हम सभी मिलकर केवल व्यापार और मुनाफे पर नहीं, बल्कि अपनों के मानसिक स्वास्थ्य और आपसी जुड़ाव पर भी खुलकर बात करें। इससे पहले कि कोई और चिराग बुझे, हमें जागना होगा। ईश्वर सभी दिवंगत आत्माओं को शांति दें और उनके परिजनों को यह असहनीय दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करें।

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