ज्ञान यज्ञ के छठे दिन कृष्ण-सुदामा मिलन की झांकी देख भावविभोर हुए श्रद्धालु
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम सोनपुर में चल रहे श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के छठे दिन 22 मई को श्रद्धालु भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी।
कथा के छठे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्यजी महाराज ने सुदामा चरित्र पर विस्तृत प्रकाश डाला। इस दौरान देवस्थानम में सुदामा-कृष्ण मिलन की भव्य झांकी भी निकाली गई, जिसे देख भक्त भावविभोर हो गये।
कथा के क्रम में स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन के मित्र थे और दोनों ने एक ही गुरुकुल में शिक्षा पाई थी। सुदामाजी के दरिद्र होने के रहस्य को उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि श्रापित चने के रहस्य को जानने के बाद, सुदामाजी ने वह चना श्रीकृष्ण को नहीं दिया, ताकि संपूर्ण जगत धन हीन न हो जाए।
उन्होंने खुद उस कष्ट को झेला। महाराज ने मित्रता की परिभाषा बताते हुए कहा कि असली मित्र वही है जो आपत्ति और विपत्ति में काम आए। कहा कि आजकल स्वार्थ के वश होकर मित्र बनते हैं और स्वार्थ समाप्त होते ही शत्रु बन जाते हैं। इस संसार में कोई किसी का स्थायी मित्र नहीं है, सच्चा मित्र केवल वह परमात्मा है जो कभी धोखा नहीं देता।
स्वामीजी ने स्पष्ट किया कि गरीब और दरिद्र में बड़ा अंतर होता है। गरीब कोई भी हो सकता है, लेकिन दरिद्र वह है जो अपने कर्मों का परित्याग कर निष्कर्मी बन जाता है। सुदामा अत्यंत अभाव में भी पूर्ण संतोषी रहे और उन्होंने कभी किसी के आगे याचना नहीं की। उन्होंने संदेश दिया कि मानव जीवन में कितनी भी विपत्ति आए, अपने धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो राजाधिराज श्रीकृष्ण अपने सखा से मिलने नंगे पैर दौड़ पड़े। भगवान ने सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाकर राजसी स्वागत किया। सुदामा ने कुछ मांगा नहीं, लेकिन प्रभु ने उन्हें लोक-दुर्लभ त्रिलोकी का ऐश्वर्य प्रदान कर दिया।
*ज्ञान यज्ञ में कमाई का 10 प्रतिशत दान करने का आह्वान*
इससे पूर्व, ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन बीते 21 मई को प्रवचन के क्रम में स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने दान की महिमा और श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने दानं दुर्गति नाशनम् का सूत्र देते हुए कहा कि कलयुग में दान की बड़ी महिमा है। प्रत्येक मनुष्य को अपनी नेक कमाई का कम से कम दशांश (10वां भाग) दान अवश्य करना चाहिए। कहा कि कमाई पर सबसे पहला अधिकार धर्म, माता-पिता, पशु-पक्षियों और समाज के जरूरतमंदों का होता है।
छठे दिन की कथा के समापन पर भागवत की महाआरती की गई, जिसके बाद भक्तों के बीच प्रसाद और भंडारे का वितरण किया गया। इस पावन अवसर पर सोनपुर, हाजीपुर (वैशाली), छपरा, पटना, मुजफ्फरपुर सहित अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। यज्ञ समिति के अनुसार यज्ञ के अगले दिन 23 मई को कलश भागवत कथा की महापूर्णाहुति होगी, इसके साथ ही विशाल महाभंडारे का आयोजन किया जाएगा।
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