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मोदी सरकार में महंगाई व् बेरोजगारी, अच्छे दिन कब आएंगे-विजय शंकर नायक

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी, तब देश की जनता से एक बड़ा वादा किया गया था कि अच्छे दिन आएंगे। यह सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं था, बल्कि करोड़ों भारतीयों की उम्मीद बन गया था। देशवासियों ने तब सोचा था कि महंगाई कम होगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा, किसानों की आय बढ़ेगी, मध्यम वर्ग को राहत मिलेगी और गरीबों का जीवन आसान होगा।

लेकिन एक दशक बाद देश का आम नागरिक आज यह पूछने को मजबूर है कि क्या अच्छे दिन सिर्फ बड़े उद्योगपतियों और अमीर वर्ग के लिए आए? आज स्थिति यह है कि आम आदमी की आय लगभग स्थिर है, लेकिन उसका खर्च कई गुना बढ़ चुका है। घर चलाना मुश्किल होता जा रहा है। रसोई से लेकर शिक्षा तक, इलाज से लेकर यात्रा तक हर क्षेत्र में महंगाई ने जनता की कमर तोड़ दी है। उक्त बाते 15 मई को झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विजय शंकर नायक ने झारखंड की राजधानी रांची के हटिया स्थित अपने कार्यालय में कही।

उन्होंने कहा कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें देशवासियों के जेब पर हमला है। कहा कि वर्ष 2014 में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आम नागरिक की पहुंच में थीं। लेकिन 2024 आते-आते ईंधन की कीमतें लगातार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गईं। नायक के अनुसार वर्ष 2014 में पेट्रोल ₹71–72 प्रति लीटर जबकि वर्ष 2026 में ₹100–110 प्रति लीटर। डीजल ₹55 प्रति लीटर से ₹88–95 प्रति लीटर।

यानी पेट्रोल लगभग 35 से 40 प्रतिशत महंगा, डीजल 60 से 70 प्रतिशत तक महंगा हुआ। कहा कि ईंधन सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं होता। उसका असर पूरे बाजार पर पड़ता है। कहा कि जब डीजल महंगा होता है तो ट्रक का किराया बढ़ता है। सब्ज़ी महंगी होती है, दूध महंगा होता है, राशन महंगा होता है और अंततः हर परिवार की रसोई प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों का हवाला दिया, लेकिन सवाल यह भी उठना लाजमी है कि जब कच्चे तेल की कीमतें कई बार कम हुईं, तब जनता को राहत क्यों नहीं मिली? क्यों पेट्रोल और डीजल पर भारी टैक्स जारी रहे?

नायक ने कहा कि एक समय था जब गैस सिलेंडर मध्यम और गरीब परिवारों की जरूरत बन चुका था। लेकिन आज वही सिलेंडर फिर से लग्जरी जैसा महसूस होने लगा है। कहा कि वर्ष 2014 में प्रति सिलिंडर कीमत ₹410 से 450 था, वर्ष 2026 में ₹900 से ₹1200 हो गया है। नायक के अनुसार केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को गैस कनेक्शन दिए। यह एक सकारात्मक कदम माना गया। वास्तविक समस्या रिफिल की लागत बनी। आज लाखों गरीब परिवार सिलेंडर भरवाने में असमर्थ हैं। कहा कि गांवों में कई घरों में रहिवासी मजबूरी वश फिर लकड़ी, उपले और कोयले का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। सवाल उठता है कि अगर गरीब गैस भरवा ही न सके, तो सिर्फ कनेक्शन देने से क्या बदला? रसोई की थाली क्यों सिकुड़ गई? देश की अर्थव्यवस्था विश्वगुरु बनने की बात करती रही, लेकिन आम आदमी की थाली लगातार छोटी होती गई।

नायक ने कहा कि रोजमर्रा की चीज़ों के दाम में भी बेतहाशा वृद्धि देखी जा सकती है। कहा कि वर्ष 2014 में वर्ष 2026 में दूध ₹36 से 40 ₹60 से 70 आटा ₹20 से 22 ₹32 से 40 दाल ₹70 से 80 ₹120 से 180 खाद्य तेल ₹70 से 90 ₹130 से 180 हो गयी है।

नायक ने कहा कि आज गरीब परिवारों के लिए दाल खरीदना कठिन हो गया। दूध सीमित करना पर रहा है। तेल और सब्ज़ियों में कटौती करनी पड़ रही है। कहा कि महंगाई सिर्फ आंकड़ा नहीं होती, यह सीधे परिवार की थाली, बच्चों के पोषण और जीवन स्तर को प्रभावित करती है।

उन्होंने कहा कि सरकारी आंकड़े भी महंगाई की सच्चाई बताते हैं। कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया और सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2020 में खुदरा महंगाई लगभग 7.59 प्रतिशत रही, वर्ष 2022 में कई महीनों तक महंगाई 7 प्रतिशत से ऊपर बनी रही। जुलाई 2023 में महंगाई दर लगभग 7.44 प्रतिशत दर्ज की गयी। कहा कि सरकार लगातार नियंत्रण के दावे करती रही, लेकिन आम जनता की जिंदगी में राहत दिखाई नहीं दी।

नायक ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे युवा देश कहलाता है। यही युवा आज सबसे ज्यादा निराश है। इकॉनमी सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में बेरोजगारी दर लगभग 4.8 प्रतिशत रही। आंकड़ों से भी बड़ी समस्या रोजगार की गुणवत्ता और स्थिरता की है। आज युवाओं की प्रमुख समस्याएँ भर्ती परीक्षाओं में लगातार देरी, पेपर लीक, रिक्त पदों का न भरना, संविदा आधारित नौकरियाँ, निजी क्षेत्र में अस्थिर रोजगार है।

कहा कि देश के लाखों छात्र वर्षों तैयारी करते हैं, लेकिन परीक्षा रद्द हो जाती है या भर्ती प्रक्रिया अधूरी रह जाती है। यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट भी बन चुका है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 में मोदी सरकार ने नोटबंदी लागू की इससे देश को क्या मिला? दावा किया गया कि काला धन खत्म होगा, भ्रष्टाचार रुकेगा, नकली नोट खत्म होंगे, आतंकवाद कमजोर होगा। बाद में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में सामने आया कि लगभग 99.3 प्रतिशत पुराने नोट वापस बैंकिंग सिस्टम में लौट आए। नतीजा क्या हुआ? छोटे व्यापार बर्बाद हुए, दिहाड़ी मजदूर बेरोजगार हुए, ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई, असंगठित क्षेत्र को भारी झटका लगा। आज भी कई अर्थशास्त्री नोटबंदी को आर्थिक रूप से असफल निर्णय मानते हैं।

नायक के अनुसार वर्ष 2020 में कोविड महामारी के दौरान अचानक लॉकडाउन लागू किया गया। सिर्फ कुछ घंटों की तैयारी में पूरा देश बंद कर दिया गया। परिणामस्वरूप करोड़ों मजदूर पैदल घर लौटे, छोटे उद्योग बंद हुए, दुकानें खत्म हुईं, लाखों देशवासियों की नौकरियाँ चली गईं। देश ने पहली बार ऐसी तस्वीरें देखी, जहाँ मजदूर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे थे। दूसरी तरफ बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों की संपत्ति और मुनाफा लगातार बढ़ता गया। यहीं से दो भारत की चर्चा तेज हुई एक अमीर भारत और दूसरा संघर्ष करता आम भारत।

उन्होंने कहा कि देश की जनता पर कई स्तरों पर टैक्स लिया जा रहा है। पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स, लगभग हर वस्तु पर जीएसटी, बिजली महंगी, शिक्षा महंगी, इलाज महंगा। मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे गरीबों की योजनाओं के पात्र नहीं, और अमीरों जैसी आय भी नहीं। यानी सबसे अधिक दबाव मध्यम वर्ग और गरीब दोनों पर है। उन्होंने कहा कि आज असल सवाल यह कि अगर पेट्रोल महंगा है, गैस महंगी है, राशन महंगा है, नौकरी कम है, पेपर लीक ज्यादा हैं, किसान परेशान हैं और युवाओं में निराशा बढ़ रही है, तो जनता पूछ रही है कि विकास आखिर हुआ कहाँ? क्या विकास सिर्फ बड़े इवेंट, चमकदार विज्ञापन, टीवी प्रचार और कॉरपोरेट मुनाफों तक सीमित रह गया?

नायक के अनुसार राष्ट्रवाद के नारों से रसोई सस्ती नहीं होती। टीवी डिबेट से रोजगार पैदा नहीं होता और प्रचार से आर्थिक संकट खत्म नहीं होता। देश की जनता आज मूलभूत सवाल पूछ रही है कि रोजगार कहाँ है? महंगाई क्यों नहीं रुकी? युवाओं का भविष्य सुरक्षित कब होगा? गरीब और मध्यम वर्ग को राहत कब मिलेगी? जनता की मांग बहुत सरल है सस्ती रसोई, सस्ता पेट्रोल, रोजगार के अवसर, पारदर्शी और जवाबदेह शासन, शिक्षा और स्वास्थ्य में राहत। कहा कि लोकतंत्र में जनता सवाल पूछती है और सरकार की जिम्मेदारी जवाब देना है।

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