अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर नगर के गांधी चौक स्थित शहीद महेश्वर संस्थान के तत्वावधान में कविता स्मृति अगस्त क्रांति संग्रहालय सभागार में 9 अप्रैल को महापंडित राहुल सांकृत्यायन की 133वीं जन्म जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर आयोजित महापंडित राहुल सांकृत्यायन और उनकी विरासत विषयक सेमिनार में वक्ताओं ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व, ऐतिहासिक शोध और सामाजिक क्रांति के आह्वान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
आयोजित सेमिनार में अपने अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र मानपुरी ने राहुल सांकृत्यायन को आधुनिक युग का अग्रदूत बताया। उन्होंने कहा कि राहुलजी 36 भाषाओं के ज्ञाता थे और उनके कद का विद्वान भारत में मिलना दुर्लभ है। वे यात्रा-साहित्य के जनक थे, जिनका मूल सिद्धांत दुनिया भर में मानवीय संबंध और संपर्क स्थापित करना था। मानपुरी ने जोर देते हुए कहा कि राहुलजी के साहित्य में प्राचीनता के प्रति मोह और अतीत के प्रति लगाव तो था, लेकिन वे नवीनता के भी प्रबल आग्रही थे। यही कारण है कि वे निरंतर प्रगति करते रहे। उन्होंने कहा कि जो विद्वान केवल अतीत में सिमट कर रह गए, वे राहुलजी जैसी बहुज्ञता प्राप्त नहीं कर सके।
सेमिनार में वक्ताओं ने राहुल सांकृत्यायन की लेखनी की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने लगभग 150 ग्रंथों की रचना की। तुलनात्मक उदाहरण देते हुए मानपुरी ने हरिवंश राय बच्चन का जिक्र किया और बताया कि कैसे महान रचनाकार अपनी विशिष्ट शैली से भाषा को समृद्ध करते हैं। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि 36 भाषाओं के ज्ञान के मामले में राहुलजी के टक्कर का कोई दूसरा विद्वान नहीं है।
वैशाली जिला के हद में आर. एन. कॉलेज हाजीपुर के हिंदी विभाग के प्रो.डॉ श्याम किशोर ने महापंडित की उपेक्षा और फिर वैश्विक स्वीकार्यता के सफर को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि कैसे राहुलजी ने तिब्बत की दुर्गम यात्राओं से 21 खच्चरों पर लादकर 2100 दुर्लभ पांडुलिपियां भारत लाकर इतिहास को समृद्ध किया, जिसकी प्रशंसा स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
वैशाली महिला कॉलेज की प्रो. डॉ कंचन ने सांकृत्यायनजी के वैचारिक पक्ष को रखते हुए कहा कि उनका संदेश था भागो नहीं, दुनिया को बदलो। उन्होंने साम्यवाद को मानवीय दुनिया के निर्माण का आधार माना और मानसिक दासता व जाति-धर्म की बेड़ियों को तोड़ने पर जोर दिया। गीतकार सीताराम सिंह ने सांकृत्यायन की वैचारिक गतिशीलता की सराहना की। उन्होंने कहा कि उनके विचारों में सनातनी से लेकर साम्यवादी तक का जो बदलाव दिखा, उसका मूल सूत्र मानव कल्याण और सत्य की खोज था।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन: संघर्ष, शास्त्र और सरोकार की विरासत
सेमिनार में वैशाली महिला कॉलेज हाजीपुर के इतिहास विभाग के प्रो. डॉ मुहम्मद इस्माइल ने सांकृत्यायन के पंडित से महापंडित बनने के सफर और किसान आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने जमींदारी प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाकर शोषित किसानों को उनका हक दिलाने का संघर्ष किया। उन्होंने महापंडित के व्यक्तित्व को नरगिस के दुर्लभ फूल की उपमा देते हुए उनके जीवन के तीन मुख्य आयामों पर प्रकाश डाला तथा कहा कि राहुलजी का ‘पंडित’ से महापंडित बनने का सफर निरंतर अध्ययन और अटूट संकल्प का परिणाम था। बचपन में पढ़ी एक किताब और एक शेर ने उन्हें ज्ञान की राह दिखाई।

वाराणसी प्रवास के दौरान उन्होंने संपूर्ण संस्कृत साहित्य को आत्मसात किया, जिससे वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद के रूप में उभरे।उनका जीवन दर्शन भीड़ से अलग राह बनाने का था। उन्होंने मोहनदास से महात्मा बनने की प्रक्रिया की तरह स्वयं को वैचारिक संघर्षों की भट्टी में तपाया। उनका मानना था कि यदि ज्ञान अर्जित करना है और समाज को दिशा देनी है, तो धूप और संघर्ष का सामना करना ही होगा। डॉ इस्माइल ने उस दौर के आर्थिक गणित को समझाते हुए बताया कि कैसे उत्पादन का 100 प्रतिशत हिस्सा (89 प्रतिशत सरकार और 11 प्रतिशत जमींदार) शोषकों के पास चला जाता था और किसान खाली हाथ रह जाता था। कहा कि सांकृत्यायनजी ने महसूस किया कि किसानों के दु:ख का मूल कारण जमींदारी प्रथा है। उन्होंने उन जमींदारों की आलोचना की जो अपनों के प्रति अंधे थे और केवल अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। इसी संवेदनशीलता ने उन्हें किसान आंदोलन का प्रखर योद्धा बनाया।
उन्होंने कहा कि राहुल सांकृत्यायन की विरासत केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ज्ञान को जन-सरोकारों और न्याय से जोड़ने की एक जीवंत परंपरा है।
श्रीसीताराम आश्रम ट्रस्ट, राघवपुर बिहटा (पटना) के अध्यक्ष कैलाशचंद्र झा ने सांकृत्यायन पर अपने शोधपरक विचार रखते हुए कहा कि राहुल सांकृत्यायन सीपीआई के सदस्य रहे। काव्य पाठ कवि ताड़क नाथ सिंह ने किया। सेमिनार में यह बात उभरकर आई कि राहुल सांकृत्यायन की विरासत केवल 150 ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ज्ञान को जन-सरोकारों और सामाजिक न्याय से जोड़ने की एक जीवंत परंपरा है। उनकी बहुज्ञता और संघर्ष आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।
वक्ताओं में बिहटा आश्रम के कैलाश चंद्र झा ने भी राहुल सांकृत्यायन पर अपने शोध परक विचार रखे। सेमिनार का संचालन अच्युत नंदन ने जबकि धन्यवाद ज्ञापित ब्रज किशोर शर्मा ने किया। इस अवसर पर साहित्यकार सारंगधर प्रसाद सिंह, पूर्वोत्तर रेलवे महाविद्यालय के अवकाश प्राप्त पुस्तकालयध्यक्ष धनंजय सिंह, कांग्रेस नेता रामविनोद सिंह, भाकपा नेता विजय कुमार शर्मा, भाकपा के सोनपुर अंचल सचिव डॉ नरेन्द्र राय, राजद नेता महेश कुमार यादव, हरिहरक्षेत्र जनजागरण मंच के अमरनाथ तिवारी, हरिहरनाथ मंदिर न्यास के सदस्य गन्नी नाथ राय, अधिवक्ता अरविंद सिंह, शिक्षक नेता मुकेश कुमार शर्मा, कवि तारक नाथ सिंह सहित बड़ी संख्या में महिलाएं भी मौजूद थी।
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