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जल-जंगल-जमीन पर बढ़ता संकट: क्या अपने मूल उद्देश्य से भटक रहा है झारखंड?

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। झारखंड राज्य का गठन जल, जंगल और जमीन की रक्षा के संकल्प के साथ हुआ था। आदिवासी अस्मिता, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और वन क्षेत्र के स्थानीय रहिवासियों के अधिकारों की रक्षा ही अलग राज्य आंदोलन की मूल भावना रही है।

लेकिन राज्य गठन के 25 वर्ष बाद आज जो हालात सामने आ रहे हैं, वे इस मूल उद्देश्य पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
ज्ञात हो कि राज्य के कई जिलों, विशेषकर बोकारो सहित अन्य क्षेत्रों में जंगलों की अंधाधुंध कटाई, सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा और जमीन की खुलेआम खरीद-फरोख्त तेजी से बढ़ रही है। वन भूमि को उजाड़कर प्लॉटिंग की जा रही है। बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं और धीरे-धीरे आदिवासी व ग्रामीण इलाकों की पहचान खत्म होती जा रही है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब प्रशासन की नजरों के सामने हो रहा है, जिससे आम जनता में गहरी नाराजगी व्याप्त है। इसी बीच बोकारो के तत्कालीन वन प्रमंडल पदाधिकारी (डीएफओ) रजनीश कुमार ने वन भूमि को भू-माफियाओं से मुक्त कराने के लिए कई सख्त और सराहनीय कदम उठाए।

अवैध कब्जों को हटाना, जमीन की पहचान करना और वन क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में उनकी कार्रवाई ने भू-माफियाओं के नेटवर्क को झकझोर दिया था।
लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, जमीन बचाने की दिशा में सक्रिय इस अधिकारी का ही स्थानांतरण कर दिया गया। सरकार के इस फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या ईमानदारी से काम करना अब व्यवस्था में असहज हो गया है? क्या भू-माफियाओं का प्रभाव इतना मजबूत हो चुका है कि वे प्रशासनिक निर्णयों को भी प्रभावित कर रहे हैं?
यहां के स्थानीय रहिवासियों के बीच यह चर्चा तेज है कि भू-माफियाओं के संबंध सिस्टम के कुछ प्रभावशाली हिस्सों से जुड़े हुए हैं, जिसके कारण उनके खिलाफ कार्रवाई टिक नहीं पा रही है। यह स्थिति शासन-प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल उठाती है।

क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में झारखंड के कई गांव जंगल विहीन हो जाएंगे। इसका सीधा असर पर्यावरण, जल स्रोतों और आदिवासी जीवन पर पड़ेगा। साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह एक गंभीर संकट साबित हो सकता है।

अब राज्य की जनता सरकार से जवाब चाहती है कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा का वादा केवल नारे तक सीमित रहेगा या वास्तव में ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देकर भू-माफियाओं पर सख्त कार्रवाई की जाएगी?
यदि समय रहते ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो झारखंड अपनी सबसे बड़ी पहचान जंगल और जमीन दोनों को खोने के कगार पर पहुंच सकता है।

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