एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय शंकर नायक ने 2 मार्च को अमेरिका व् इजराइल द्वारा ईरान पर हमलों की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे देश के लिए महाशक्ति बनने तथा आत्मनिर्भर बनने का अवसर करार दिया।
वरिष्ठ कांग्रेसी नायक ने कहा कि पश्चिम एशिया सदियों से साम्राज्यों की टकराहट, ऊर्जा की राजनीति और वैचारिक संघर्षों की धधकती भट्टी रहा है। वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति ने रूहोल्लाह ख़ुमैनी के नेतृत्व में ईरान को एक वैचारिक दुर्ग में रूपांतरित कर दिया। उस क्रांति की प्रतिध्वनि आज भी क्षेत्रीय समीकरणों में गूंजती है। कहा कि बीते 28 फरवरी को जब यूनाइटेड स्टेट (अमेरिका) और इजराइल ने संयुक्त सैन्य अभियान आरम्भ किया। इज़राइल ने इसे ऑपरेशन रोअरिंग लायन और अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया।
इससे यह स्पष्ट हो गया कि इतिहास ने एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया है। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामनेई, उनका परिवार सहित अनेक शीर्ष ईरानी अधिकारी मारे गए। इसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई ने खाड़ी देश दुबई, अबू धाबी, दोहा को युद्ध की सीधी जद में ला दिया। यह अब सीमित संघर्ष नहीं रहा। यह वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था, समुद्री व्यापार और भू-राजनीतिक संतुलन को हिलाने वाला भूकंप बन चुका है। इस भूकंप का कंपन भारत तक स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही हैं।
नायक ने कहा कि भारत अपनी 85 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल की आवश्यकता का आयात करता है। कहा कि खाड़ी देश इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत पर हमारी निर्भरता 50 प्रतिशत से अधिक है। होर्मुज़ जलडमरू मध्य, जिससे विश्व का लगभग पाँचवाँ हिस्सा तेल गुजरता है, अब प्रभावी रूप से अवरुद्ध है। जहाज़ों की आवाजाही ठप, बीमा प्रीमियम दोगुना और ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर के पार।
दीर्घकालिक युद्ध की स्थिति में 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसका सीधा परिणाम पेट्रोल, डीज़ल, एलपीजी, सीएनजी में तीव्र वृद्धि, परिवहन लागत 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना, खाद्य महंगाई में उछाल, चालू खाता घाटा 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। ऐतिहासिक दबाव में यह केवल आर्थिक झटका नहीं बल्कि यह विकास दर और सामाजिक स्थिरता पर संयुक्त प्रहार है। स्टैगफ्लेशन का खतरा वास्तविक है।
नायक ने कहा कि भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में 500 मिलियन डॉलर से अधिक निवेश किया था, ताकि पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाई जा सके। आज वह परियोजना लगभग ठहराव पर है। बंदरगाह संचालन बाधित है। अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) प्रभावित, क्षेत्रीय प्रभाव के लिए चीन को अवसर। यह केवल एक बंदरगाह का प्रश्न नहीं, यह भारत की दीर्घकालिक भू-रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा है। उन्होंने कहा कि भारत की त्रिकोणीय स्थिति अत्यंत जटिल है।
अमेरिका रणनीतिक साझेदार, क्वाड सहयोग, इज़राइल रक्षा तकनीक और खुफिया सहयोग का स्तंभ, ईरान ऊर्जा और भू-राजनीतिक पहुँच का सेतु है। भारत का एकतरफा रुख से किसी एक धुरी के साथ संबंध स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता हैं। संयुक्त राष्ट्र में मतदान से लेकर प्रतिबंधों के अनुपालन तक, हर निर्णय भविष्य की दिशा तय करेगा। भारत को रणनीतिक स्वायत्तता को केवल सिद्धांत नहीं, व्यवहार में सिद्ध करना होगा।
नायक ने कहा कि खाड़ी देशों में 90 लाख से अधिक भारतीय कार्यरत हैं, जो सालाना 50 अरब डॉलर से अधिक रेमिटेंस भेजते हैं। यदि युद्ध तीव्र होता है तो व्यापक निकासी अभियान की आवश्यकता, रेमिटेंस में 20 से 30 प्रतिशत तक गिरावट, लौटते श्रमिकों से घरेलू रोजगार संकट, वर्ष 1990 के कुवैत संकट जैसी ऐतिहासिक एयरलिफ्ट की पुनरावृत्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत का 55 प्रतिशत से अधिक समुद्री व्यापार पश्चिम एशिया से होकर गुजरता है। शिपिंग बीमा महंगा, माल भाड़ा दोगुना, उर्वरक और गैस आपूर्ति बाधित, कृषि और उद्योग दोनों प्रभावित होगा। वैश्विक बाजारों में गिरावट, सोना रिकॉर्ड स्तर पर, विदेशी निवेशकों की निकासी यह समग्र अस्थिरता भारत की वित्तीय प्रणाली को झकझोर सकती है।
नायक के अनुसार आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते। साइबर हमले, दुष्प्रचार अभियान और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास, ये सभी भारत की आंतरिक स्थिरता के लिए चुनौती हैं। कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा अब बहुआयामी हो चुकी है। ऊर्जा, डिजिटल, सामाजिक और सामरिक हो गया है।
संकट से अवसर तक: भारत का ऐतिहासिक क्षण
नायक ने कहा कि इतिहास सिखाता है कि महान राष्ट्र संकटों की भट्टी में तपकर ही उभरते हैं। यह समय भारत के लिए केवल बचाव का नहीं, रूपांतरण का है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय मिशन बनाया जाए। सामरिक तेल भंडार 3 सप्ताह से बढ़ाकर 90 दिन तक, नवीकरणीय ऊर्जा में वैश्विक नेतृत्व, रक्षा स्वदेशीकरण में निर्णायक छलांग, संतुलित, सक्रिय और स्वाभिमानी कूटनीति अपनाने की जरूरत है। कहा कि यह युद्ध दूर जल रहा है, पर उसका धुआँ भारत की अर्थव्यवस्था, समाज और भविष्य को घेर रहा है।
यह क्षण भय का नहीं बल्कि दृढ़ निर्णय का है। यह समय प्रतिक्रियात्मक राजनीति का नहीं बल्कि रणनीतिक दूरदर्शिता का है। यदि भारत इस संकट को आत्मनिर्भरता, ऊर्जा विविधीकरण, सामरिक संतुलन और सामाजिक एकता के अवसर में बदल दे, तो यही संघर्ष उसे एक अधिक सशक्त, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर कर सकता है। कहा कि इतिहास प्रतीक्षा नहीं करता।
निर्णायक कदम आज उठाने होंगे, अन्यथा कल बहुत देर हो जाएगी।
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