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धर्मगुट्टू फुटबॉल मैदान में सरकार को अवगत कराने के लिए आम सभा का आयोजन

लोकतंत्र में जनता के पास सबसे बड़ी ताकत, हिंसात्मक कदम की जरूरत नहीं-मंत्री

सिद्धार्थ पांडेय/चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम)। सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम सिंहभूम जिला के हद में सारंडा के वन क्षेत्र 576 वर्ग मीटर को सेंकचुरी सुनवाई किए जाने के विरोध में झारखंड सरकार द्वारा 30 सितंबर को जन सुनवाई किया गया।

जिला के हद में छोटा नागरा के धर्मगुट्टू फुटबॉल मैदान में आम सभा का आयोजन किया गया। सभा में मौजूद 56 गांवों के प्रतिनिधियों ने अपने अपने विचार रखे। लगुड़ा देवगम मनकी ने कहा कि सेंचुरी बने तो पहले ग्रामीणों का संरक्षण और विकास सुनिश्चित हो। रोआम रहिवासी रामो सिद्धू ने कहा कि खदानें, जंगल और नदी-नाले को बर्बाद कर रही हैं, पर रोजगार नहीं दे रहीं। पंचायत समिति सदस्य रामेश्वर चांपिया ने कहा कि ग्राम सभा की अनुमति के बिना सेंचुरी का कोई औचित्य नहीं।

इस अवसर पर मुखिया मंगल सिंह गिलुआ ने कहा कि अगर रहिवासियों को फायदा होगा तो वे समर्थन करेंगे, लेकिन अस्तित्व और अधिकार से समझौता नहीं। ग्रामीण बामिया माझी कहा कि सेंचुरी का प्रस्ताव केंद्र सरकार का दबाव है, इससे आदिवासी अधिकार खत्म होंगे। अमर सिंह सिद्धू के अनुसार सारंडा के आदिवासी परंपरा पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। यदि सेंकचुरी घोषित हो जाता है तो आदिवासी समुदाय के बीच शासन दीरी महत्वपूर्ण स्थान रखता है उसे उठा कर कहां भटकेंगे। के. सी. हाइबुरु के अनुसार सारंडा में केवल मानकी–मुंडाओं का कानून चलेगा, बाहरी कानून लागू नहीं होगा।

सभा के अंत में समिति अध्यक्ष मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि झारखंड सरकार के निर्देश पर पांच सदस्यीय टीम छोटानागरा आई है। यहां आने का उद्देश्य बिल्कुल साफ है। हमें यह बताने में काफी खुशी हो रही है कि झारखंड सरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का आदर, सम्मान और उसकी मर्यादा की रक्षा बेहतर तरीके से करना जानती है।हमारी सरकार इस पर विश्वास करती है कि यह संवैधानिक प्रणाली जनता के द्वारा, जनता का और जनता के लिए स्थापित की गई है। तीनों अंग जनता के हितधारक हैं और जनता सर्वोपरि है। आप जनता की सोच और भावनाओं के विपरीत हमारी सरकार नहीं जा सकती है। सरकार चाहे देश अथवा राज्य की हो, प्रकृति, मानव और वन्य जीवों की रक्षा करना हमारा संकल्प है। हम यह भी कहना चाहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने सारंडा को वन्य प्राणी आश्रयणी घोषित करने की दिशा में कुछ निर्देश दिए हैं। हमारी सरकार न्यायपालिका का पूरा सम्मान करती है।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंत्रियों के समूह को इस लिए यहां भेजा है कि आप सारंडा जाकर जनभावनाओं से अवगत हों, उनके विचारों और उनकी चाहत को सुनें। तमाम जनप्रतिनिधि आपके विचारों से अवगत हुए हैं। आपकी समस्याओं की जानकारी हमें मिली है। उन्होंने कहा कि आपको विश्वास दिलाते हैं कि आपकी भावनाएं संकलित करके सरकार को अवगत कराया जाएगा। आप सभी से एक अपेक्षा और आग्रह करेंगे कि देश को आजादी हिंसा से नहीं बल्कि अहिंसा से मिली है। लोकतंत्र में जनता के पास सबसे बड़ी ताकत है। मंच का आपसे आग्रह होगा कि कोई भी हिंसात्मक कदम उठाने की जरूरत नहीं है। जो आप चाहते हैं, उसे नियम-कानून के तहत लोकतांत्रिक तरीके से धरातल पर लाने का पूरा प्रयास करेंगे।

सभा की अध्यक्षता राधाकृष्ण किशोर ने की। उनके साथ समिति के सदस्य मंत्री दीपक बिरुवा, चमरा लिंडा, संजय प्रसाद यादव और दीपिका पांडे सिंह भी मौजूद थे। इसके अलावा सांसद जोबा माझी, विधायक सोनाराम सिंकू, निरल पूर्ति, सुखराम उरांव, जगत माझी, जिला परिषद सदस्य लक्ष्मी सोरेन, जिला उपायुक्त चंदन कुमार, पुलिस अधीक्षक अमित रेणु, सारंडा डीएफओ अभिरूप सिन्हा सहित कई प्रमुख अधिकारी भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का यह निष्कर्ष निकला कि फैसला जनता के हाथ में सारंडा के घने जंगलों में आज विकास बनाम अधिकार की जंग छिड़ी हुई है। कहा गया कि जहां एक ओर वन्य जीवों और पर्यावरण संरक्षण की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर आदिवासियों की आजीविका और परंपरागत अधिकार भी उतने ही अहम हैं। झारखंड सरकार की विधानसभा स्तरीय समिति ने साफ कहा है कि जनता की राय सर्वोपरि है। अब देखने वाली बात होगी कि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय मिलकर किस तरह इस संतुलन को साधते हैं।

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