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विश्व आदिवासी दिवस पर विजय शंकर नायक द्वारा विशेष लेख

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। विश्व आदिवासी दिवस न केवल एक उत्सव है, बल्कि आदिवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, उनके पर्यावरणीय योगदान और उनके सामने आने वाली गंभीर चुनौतियों को उजागर करने का एक वैश्विक मंच है। यह विचार केंद्रीय उपाध्यक्ष, आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के विजय शंकर नायक के है।

नायक के अनुसार विश्व आदिवासी दिवस, जो हर साल 9 अगस्त को मनाया जाता है, न केवल एक उत्सव है, बल्कि आदिवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, उनके पर्यावरणीय योगदान और उनके सामने आने वाली गंभीर चुनौतियों को वैश्विक मंच पर उजागर करने का एक अवसर है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1994 में इस दिन की स्थापना की थी, ताकि आदिवासियों के अधिकारों, उनकी अनूठी जीवन शैली और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए जागरूकता बढ़ाई जा सके।

प्रकृति के सच्चे संरक्षक आदिवासी समुदाय प्रकृति के साथ गहरा सामंजस्य रखते हैं, जो उनकी जीवन शैली, विश्वास और प्रथाओं में स्पष्ट रूप से झलकता है। चाहे दक्षिण अमेरिका के यानोमामी हों, अफ्रीका के मासाई, ऑस्ट्रेलिया के अबोरिजिनल समुदाय या भारत के संथाल, गोंड और भील। यह समुदाय प्रकृति के संरक्षक के रूप में उभरते हैं। उनकी पारंपरिक प्रथाएं, जैसे टिकाऊ खेती, जंगल प्रबंधन और औषधीय पौधों का उपयोग, आधुनिक पर्यावरण नीतियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उदाहरण के लिए, भारत के बस्तर क्षेत्र में गोंड जनजाति की झूम खेती (शिफ्टिंग कल्टिवेशन) मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने का एक टिकाऊ तरीका है, जो आधुनिक जैविक खेती के सिद्धांतों से मेल खाता है।

इसी तरह, ओडिशा की डोंगरिया कोंध जनजाति ने नियामगिरी पहाड़ियों को खनन से बचाने के लिए अपने पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक एकजुटता का उपयोग किया। विश्व बैंक की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी समुदायों द्वारा संरक्षित वन क्षेत्रों में जैव-विविधता का ह्रास गैर-आदिवासी क्षेत्रों की तुलना में 30 प्रतिशत कम है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, विश्व के 80 प्रतिशत से अधिक जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय रहते हैं, जो वैश्विक पर्यावरण संरक्षण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।

भारत में, वन विभाग की 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी समुदायों द्वारा प्रबंधित सामुदायिक वन क्षेत्रों में वनों की कटाई की दर औसत से 25 प्रतिशत कम है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि आदिवासियों का पर्यावरणीय योगदान वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण है, फिर भी उनकी इस भूमिका को नीति-निर्माण में शायद ही उचित स्थान मिलता है।

सांस्कृतिक धरोहर: मानव सभ्यता की अनमोल निधि

आदिवासी समुदायों की कला, संगीत, नृत्य और मौखिक परंपराएं मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं। भारत में, संथाल जनजाति का सोहराय उत्सव, जिसमें प्रकृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। उनकी पर्यावरणीय संवेदनशीलता को दर्शाता है। इसी तरह, मिज़ो जनजाति के लोकगीत और मध्य प्रदेश की गोंड जनजाति की पारंपरिक चित्रकला उनके जीवन दर्शन और सौंदर्य बोध को जीवंत बनाते हैं। यूनेस्को की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की 7,000 भाषाओं में से लगभग 50 प्रतिशत आदिवासी भाषाएं हैं। इनमें से 50 प्रतिशत से अधिक 21वीं सदी के अंत तक विलुप्त होने के कगार पर हैं। भारत में 700 से अधिक आदिवासी समुदायों की 100 से अधिक भाषाएं और बोलियां खतरे में हैं। जैसा कि भारत सरकार की 2021 की भाषाई सर्वेक्षण रिपोर्ट में उल्लेखित है।

भाषा संगठन जैसे गैर-सरकारी संगठनों ने भारत में 300 से अधिक आदिवासी भाषाओं को डिजिटल रूप से संरक्षित करने का कार्य शुरू किया है, जिसमें गोंडी, संथाली और मुंडारी जैसी भाषाएं शामिल हैं। इन भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित पारंपरिक ज्ञान, जैसे औषधीय पौधों का उपयोग और मौसम चक्र की समझ, आधुनिक विज्ञान के लिए अमूल्य है। डिजिटल आर्काइविंग और शिक्षा प्रणाली में इन भाषाओं को शामिल करना न केवल सांस्कृतिक संरक्षण के लिए, बल्कि वैश्विक ज्ञान प्रणाली को समृद्ध करने के लिए भी आवश्यक है।

चुनौतियां: अधिकारों का हनन और सामाजिक हाशियाकरण

आदिवासी समुदायों को भूमि अधिग्रहण, खनन और औद्योगीकरण के कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन का सामना करना पर रहा है। भारत में, वन अधिकार अधिनियम (2006) और संविधान की पांचवीं अनुसूची के बावजूद, आदिवासियों के भूमि अधिकारों का उल्लंघन एक गंभीर समस्या बनी हुई है। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में खनन परियोजनाओं के कारण हजारों आदिवासी परिवार अपनी पुश्तैनी जमीनों से विस्थापित हुए हैं। विश्व स्तर पर अमेज़न की यानोमामी जनजाति अवैध खनन और वनों की कटाई से जूझ रही है।

संयुक्त राष्ट्र की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में 40 प्रतिशत आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक भूमि से विस्थापित हो चुके हैं, जिनमें से अधिकांश को उचित मुआवजा या पुनर्वास नहीं मिला। भारत में वर्ष 2023 की एक स्वतंत्र अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण 50 लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, विस्थापन और सामाजिक हाशियाकरण के कारण आदिवासियों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे अवसाद और चिंता, शहरी आबादी की तुलना में 2.5 गुना अधिक हैं।

विस्थापन के कारण आदिवासियों की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उनकी पारंपरिक आजीविका, जैसे खेती और वन-आधारित व्यवसाय छिन जाते हैं, जिससे आर्थिक और मानसिक संकट बढ़ता है। इस मानसिक स्वास्थ्य संकट को नीति-निर्माण में प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। विश्व आदिवासी दिवस आदिवासी महिलाओं की आवाज़ का दिवस आदिवासी महिलाओं की आवाज़ थीम पर केंद्रित है, जो आदिवासी महिलाओं के नेतृत्व, साहस और उनकी दोहरी चुनौतियों (लैंगिक और सांस्कृतिक भेदभाव) पर प्रकाश डालता है।

भारत में, ओडिशा की डोंगरिया कोंध महिलाओं ने नियामगिरी पहाड़ियों को वेदांता जैसे कॉर्पोरेट खनन से बचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। मध्य प्रदेश की गोंडी महिलाएं अपनी पारंपरिक चित्रकला को न केवल संरक्षित कर रही हैं, बल्कि इसे वैश्विक मंच पर ले जाकर आर्थिक सशक्तीकरण भी हासिल कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी महिलाएं अपने समुदायों में 60 प्रतिशत से अधिक सांस्कृतिक और पारंपरिक ज्ञान की संरक्षक हैं।

भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (2024) के आंकड़ों के अनुसार, आदिवासी महिलाओं द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूहों ने 10 लाख से अधिक परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है। आदिवासी महिलाएं न केवल सांस्कृतिक संरक्षक हैं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की वाहक भी हैं। फिर भी, उनकी नेतृत्व क्षमता को विकास नीतियों में शायद ही शामिल किया जाता है।

वर्ष 2025 की थीम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो नीति-निर्माताओं को उनकी आवाज़ को मुख्यधारा में लाने के लिए प्रेरित करती है। समावेशी और टिकाऊ विकास विश्व आदिवासी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि आदिवासियों की आवाज़ को सुनना, उनके अधिकारों को संरक्षित करना और उनकी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देना एक वैश्विक जिम्मेदारी है। उनके पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान, शिक्षा और नीति-निर्माण में एकीकृत करना होगा। साथ ही, उनकी भाषाओं, कला और परंपराओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्कूल पाठ्यक्रम के माध्यम से संरक्षित करना होगा।

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