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टूटी-फूटी झोपड़ी में 30 साल से रह रहे ओडिशा के एक बुज़ुर्ग का 5 किलो राशन पर गुज़ारा

पीयूष पांडेय/बड़बिल (ओडिशा)। गरीबों और कमजोर वर्गो के उत्थान के उद्देश्य से कई सरकारी योजनाओं के बावजूद, कई योग्य लाभार्थी कल्याणकारी योजनाओं के दायरे से आज भी बाहर हैं। ऐसा ही एक मामला ओडिशा के गंजम जिला के हद में पात्रापुर ब्लॉक के कुमुझुरी गांव से सामने आया है। जहां एक रहिवासी बुजुर्ग दशकों से कथित तौर पर बुनियादी सरकारी सहायता से वंचित है।

बताया जाता है कि ग्रामीण रहिवासी चैतन्य सबर लगभग 30 साल से एक टूटी-फूटी फूस की झोपड़ी में रह रहे हैं। आमदनी का कोई पक्का सोर्स नहीं होने और गुज़ारे के सीमित साधनों के कारण, उन्हें मुश्किल हालात में रहना पर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि चैतन्य की हालत कुछ पिछड़े परिवारों की मुश्किलों की बानगी है, जिन्हें अभी तक ज़रूरतमंदों के लिए बने कल्याणकारी कार्यक्रम का लाभ नहीं मिला है।

चैतन्य करते है सरकारी चावल और जंगल के संसाधनों पर गुज़ारा

स्थानीय रहिवासियों के मुताबिक, चैतन्य अपनी रोज़ी-रोटी के लिए ज़्यादातर सरकारी फ़ूड सिक्योरिटी स्कीम के तहत बांटे जाने वाले प्रतिमाह 5 किलोग्राम चावल और पास के जंगलों से इकट्ठा किए गए संसाधनों यथा कंद मुल पर निर्भर हैं। उनकी खराब हालत के बावजूद, कहा जाता है कि उन्हें किसी भी हाउसिंग स्कीम के तहत मदद नहीं मिली है और न ही उन्हें पेंशन का फ़ायदा मिला है।

कुमुझुरी गांव के उक्त बेसहारा चैतन्य सबर ने 23 जून को भेंट में ओड़िया भाषा में अपना दर्द बयान करते हुए कहा कि मैं यहां 30 साल से रह रहा हूँ। कहा कि इन मुश्किल हालात में रहते हुए साइक्लोन और तूफान झेले हैं। सरकार मुझे सिर्फ़ 10 किलो चावल देती है। मैं अब 61 साल का हूँ, लेकिन मुझे कोई पेंशन या दूसरी आर्थिक मदद नहीं मिलती। जिस दिन कोई मुझे खाना देता है, मैं खा लेता हूं। नहीं तो, मैं पानी पीकर गुज़ारा करता हूं। कहा कि अगर सरकार मुझे घर दे, तो यह बहुत बड़ी मदद होगी।

इस मामले ने स्थानीय स्तर पर ध्यान खींचा है और रहिवासी सवाल कर रहे हैं कि इतने कमज़ोर हालात में रहने वाले इंसान को ज़रूरी कल्याणकारी कार्यक्रम से बाहर क्यों रखा गया है। आरोपों का जवाब देते हुए उक्त गांव के सरपंच ने कहा कि वह खुद चैतन्य के घर जाएंगे, हालात का जायजा लेंगे और हाउसिंग स्कीम के एप्लीकेशन के लिए ज़रूरी फोटो का इंतज़ाम करेंगे। उन्होंने कहा कि यह मामला प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) के ध्यान में लाया जाएगा। उनसे जल्द से जल्द हाउसिंग मदद देने की प्रार्थना की जाएगी।

रहिवासियों के अनुसार बेसहारा चैतन्य सबर मुलरूप से कम्पाकुंडा रहिवासी हैं। कम्पाकुंडा में उनके परिवार का क्या हुआ? क्या वे गुज़र गए या? वह इधर-उधर घूमकर छोटे-मोटे काम कर रहे थे। उन्होंने घर के लिए अप्लाई किया था के जबाब में रहिवासी बताते है कि असल में उन्होंने सरकारी घर के लिए अप्लाई ही नहीं किया है। उनका कहना है कि उनके पास घर नहीं है। पत्रपुर ब्लॉक के तुरुबुडी ग्राम पंचायत के सरपंच दुर्योधन साहू के अनुसार ऐसी ज़मीन पर घर बनाने का कोई नियम नहीं है जिसका डीड न हो। क्योंकि ज़मीन का कोई डीड नहीं है, इसलिए जाकर पता करेंगे। फिर बीडीओ को अप्लाई करेंगे। बीडीओ जो भी तय करेंगे, वही किया जाएगा। ध्यान देने योग्य है कि यह मामला उन कमियों को दिखाता है जो अभी भी हर योग्य बेनिफिशियरी तक वेलफेयर बेनिफिशियरी को पहुँचाने में मौजूद हैं।

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