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भागवत साक्षात श्रीहरि का वांग्मय स्वरूप, श्रवण मात्र से मिलता है वैकुंठ-लक्ष्मणाचार्य

भव्य कलश यात्रा के साथ सात दिवसीय श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ का दिव्य शुभारंभ

अ​वध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के पावन सनातनी मुहूर्त पर 17 मई को सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित श्रीगजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम दिव्य देश नौलखा मंदिर में धर्मानुकूल विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच सात दिवसीय श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ का भव्य शंखनाद किया गया। इस अलौकिक आध्यात्मिक अनुष्ठान का आरंभ एक दिव्य कलश यात्रा के साथ किया गया, जिसने पूरे वातावरण को भक्तिमय कर दिया।

​यह मंगलमयी कलश यात्रा स्थानीय देवस्थानम से प्रारंभ होकर बाबा हरिहरनाथ मंदिर के दर्शन करते मेला क्षेत्र की परिक्रमा कर ऐतिहासिक गजेन्द्र मोक्ष घाट पहुंची। गंगा-गंडक के इस पावन संगम तट पर विद्वान आचार्यों द्वारा मंगल मंत्रों का सस्वर पाठ किया गया। यहां जलमातृका, थलमातृका, स्थलमातृका और वरुण देवता का षोडशोपचार पूजन कर पवित्र जल का संचय (जलाहरण) किया गया।

इसके पश्चात, कलशधारियों ने देवस्थानम की परिक्रमा करते हुए कथा पंडाल में अपने-अपने कलश स्थापित किए। समस्त देवी-देवताओं के आह्वान के साथ ही विद्वानों द्वारा श्रीमद्भागवत पुराण के मूल पारायण का श्रीगणेश किया गया।

​भागवत शब्द का अलौकिक अर्थ: भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की तरुणावस्था

बताया जाता है कि ​दोपहर तीन बजे ज्ञानयज्ञ के मुख्य धर्म मंच पर स्थापित रजत सिंहासन पर विराजमान जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्यजी ने सर्वप्रथम श्रीमद्भागवत महात्म्य की अमृत वर्षा करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत कोई सामान्य ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात भगवान श्रीकृष्ण की वांगमयी (शब्दमयी) मूर्ति है।

इसका श्रवण और पठन मनुष्य को साक्षात वैकुंठ धाम की प्राप्ति कराता है। कहा कि यह कथा संसार के राग-द्वेष को मिटाकर जीव को परमात्मा से जोड़ती है और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष प्रदान करती है। स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने भागवत शब्द की दिव्य व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें समाहित चार अक्षर जीवन का सार हैं।

उन्होंने कहा कि प्रथम अक्षर ​भ से भक्ति,​ ग से ज्ञान,​ व से वैराग्य एवं ​त से तरुणावस्था ​अर्थात, जिस कथा को सुनने से मनुष्य के जीवन में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य युवावस्था (तरुणावस्था) में आ जाएं, वही भागवत है। भगवत ​कथा की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि मानव जीवन में कम से कम एक बार संकल्प लेकर कथा सुनने वाले जीव को कभी नारकीय यातनाएं नहीं भोगनी पड़तीं।

यह ग्रंथ कल्पवृक्ष के समान है। कहा कि जो श्रद्धालु अपने घरों में इस पवित्र ग्रंथ को स्थान देते हैं, उनके पितर तृप्त होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। म्रियमाण पुरुष (जिसकी मृत्यु निकट हो) को भागवत अवश्य सुननी चाहिए, क्योंकि यह मृत्यु के भय को समूल नष्ट कर देती है।

कथा के प्रथम दिन महाराजश्री ने भक्ति देवी के सुंदर उपाख्यान का वर्णन कर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। ​इस पावन अध्यात्म-उत्सव के प्रथम दिन क्षेत्र के अनेक गणमान्य श्रद्धालु और भक्तगण उपस्थित रहे, जिनमें दिलीप झा, रतन कुमार कर्ण, रामबाबू शर्मा, फुल झा, नीलिमा कर्ण, पूनम शर्मा, सियामणि कुंवर, सुनीता सिंह, इंदु कुमारी, गायत्री शुक्ला, अहिल्या देवी, भोला सिंह, सोहन राय, बीरेन्द्र शास्त्री, शिवकुमार झा, शिवकुमार नारायण शास्त्री, शुभम चौबे, गोपाल झा सहित भारी संख्या में माताएं-बहनें और श्रद्धालु सम्मिलित हुए।​

दिन के सत्र की पूर्णाहुति भगवान की दिव्य आरती और महाप्रसाद वितरण के साथ की गयी, जिसे पाकर श्रद्धालु धन्य हुए। ज्ञात हो कि ​यह ज्ञान यज्ञ आगामी छह दिनों तक निरंतर अध्यात्म की रसधार बहाता रहेगा।

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