अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। लोक आस्था का महापर्व चैती छठ 25 मार्च को उदयाचलगामी भगवान भास्कर को द्वितीय अर्घ्य अर्पण के साथ हर्षोल्लास संपन्न हो गया।
इस अवसर पर सारण जिले के विभिन्न नदी घाटों पर श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा, जहां व्रतियों ने 36 घंटे के कठिन निर्जला उपवास के बाद पारण किया।

जिला के हद में बहनेवाली सरयू नदी, गंगा नदी, गंडकी नदी सहित अनेक छोटी नदियों के घाटों, तालाबों व बड़े जलाशयों पर सुबह से ही उत्सव का माहौल था। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच व्रतियों ने उदीयमान सूर्य को दूध और जल से अर्घ्य दिया। न केवल नदियों में, बल्कि कई श्रद्धालुओं ने अपने घरों की छतों, दरवाजों और तालाबों पर भी इस कठिन अनुष्ठान को पूर्ण किया। सूप में सजे ठेकुआ, केला, सेब और मौसमी फलों का नैवेद्य भगवान भास्कर को समर्पित किया गया।
आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
जिला के हद में सोनपुर स्थितबाबा हरिहरनाथ मंदिर के मुख्य अर्चक आचार्य सुशील चंद्र शास्त्री ने इस पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उगते सूर्य को अर्घ्य देना पूर्णता और नई शुरुआत का प्रतीक है। डूबते सूर्य के बाद उगते सूर्य की पूजा हमें सिखाती है कि जीवन में अंधकार के बाद प्रकाश निश्चित है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी, तांबे के पात्र से गिरती जल की धार से छनकर आने वाली सूर्य की किरणें शरीर के चक्रों को संतुलित करती हैं और आंखों की रोशनी बढ़ाती हैं।
सोनपुर और सबलपुर में भक्तिमय वातावरण
जिला के हद में सोनपुर अंचल के पहलेजा धाम घाट, सबलपुर और नमामि गंगे घाटों पर भी छठ की छटा देखते ही बनी। पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाएं और सिर पर दौरा-डाला उठाए पुरुष सदस्य घाटों की ओर बढ़ते रहे। व्रतियों ने कमर भर पानी में खड़े होकर संतान की लंबी आयु और राष्ट्र की सुख-समृद्धि की कामना की। संपूर्ण आयोजन के दौरान प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद दिखा। घाटों पर सफाई, लाइटिंग और सुरक्षा के लिए बैरिकेडिंग की पुख्ता व्यवस्था की गई थी। अर्घ्य के पश्चात व्रतियों द्वारा प्रसाद वितरण के साथ ही चार दिवसीय इस महापर्व का समापन हो गया।
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