एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। आज संविधान निर्माता अंबेडकर का नाम सबके पास है, लेकिन उनके विचार किसके पास है? सिर्फ जयंती तक सीमित क्यों कर दिया गया बाबा साहब को? डॉ अंबेडकर के अनछुए पहलू का अवलोकन जरूरी हो गया है।
हर साल हम बाबा साहब की जयंती मनाते हैं। मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, मालाएं चढ़ती हैं और सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलियों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन एक कड़वा सवाल हर बार खड़ा होता है कि क्या हमने सच में बाबा साहब को समझा है या सिर्फ उन्हें एक प्रतीक बनाकर उनके विचारों को दबा दिया है?
भीमराव रामजी अंबेडकर को हमने संविधान निर्माता कहकर सीमित कर दिया, जबकि उनका व्यक्तित्व इससे कहीं ज्यादा व्यापक और क्रांतिकारी था। सच तो यह है कि आज का भारत अंबेडकर को पढ़ने से ज्यादा उन्हें उपयोग करने में लगा है। भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल व्यक्ति नहीं बल्कि विचारधारा, संघर्ष और परिवर्तन के प्रतीक बन जाते हैं। डॉ अंबेडकर ऐसा ही एक विराट व्यक्तित्व हैं, जिन्हें हम प्यार से बाबा साहब कहते हैं। अक्सर उन्हें संविधान निर्माता, दलितों के मसीहा या सामाजिक न्याय के योद्धा के रूप में सीमित कर दिया जाता है, लेकिन सच यह है कि अंबेडकर का व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक, गहरा और क्रांतिकारी था। उनके जीवन के कई ऐसे पहलू हैं, जिन पर आज भी पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है और शायद जानबूझकर नहीं की गई।
बहुत कम देशवासी जानते हैं कि बाबा साहब एक उच्च कोटि के अर्थशास्त्री भी थे। उन्होंने कोलम्बिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में गहन अध्ययन किया। उनकी प्रसिद्ध थीसिस द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी आज भी भारतीय मुद्रा नीति के लिए प्रासंगिक मानी जाती है। उनके आर्थिक विचार इतने आधुनिक थे कि उन्होंने भारत में रिज़र्व बैंक जैसी संस्था की कल्पना पहले ही कर ली थी। यह एक ऐसा पहलू है, जिसे आज भी शिक्षा और राजनीति में पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
अक्सर यह बताया जाता है कि आंबेडकर सामाजिक न्याय के लिए लड़े, लेकिन यह कम बताया जाता है कि उन्होंने भारत के औद्योगिक और जल संसाधन विकास की भी नींव रखी। उन्होंने दामोदर घाटी परियोजना, हिराकुंड बांध जैसी योजनाओं की परिकल्पना की थी। वास्तव में, भारत के आधुनिक बुनियादी ढांचे की सोच में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पहलू इतिहास की किताबों में लगभग गायब है।
आज जब महिला सशक्तिकरण की बात होती है, तो कई नेता और संगठन इसका श्रेय लेने की कोशिश करते हैं। सच्चाई यह है कि बाबा साहब ने 1950 के दशक में ही महिलाओं के लिए समान अधिकारों की नींव रख दी थी। उनका प्रस्तावित हिंदू कोड बिल महिलाओं को संपत्ति, विवाह और तलाक में बराबरी देने वाला था। तब इस बिल का विरोध इतना तीव्र हुआ कि उन्हें कानून मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह घटना बताती है कि अंबेडकर केवल दलितों के नहीं, बल्कि हर शोषित वर्ग के लिए लड़ रहे थे।
वर्ष 1956 में जब उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया, तो यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक सामाजिक क्रांति थी। उन्होंने लाखों देशवासियों को एक ऐसी पहचान दी, जो सम्मान और समानता पर आधारित थी। एक अनछुआ पहलू यह है कि उन्होंने बौद्ध धर्म को भी नए रूप में प्रस्तुत किया जिसे नवयान बौद्ध धर्म कहा जाता है। यह परंपरागत बौद्ध धर्म से अलग था और सामाजिक न्याय पर अधिक केंद्रित था।
एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि अंबेडकर के कई विचारों को जानबूझकर मुख्यधारा से दूर रखा गया। उनके कई लेख और भाषण आज भी आम जनता तक नहीं पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए, उनकी किताब एनीहिलियेशन ऑफ कास्ट एक ऐसी क्रांतिकारी रचना है, जो आज भी सामाजिक ढांचे को चुनौती देती है। इसे अक्सर पाठ्यक्रमों में सीमित कर दिया गया है या नजरअंदाज किया गया है।
गांधी-अंबेडकर मतभेद: सच्चाई जो छिपाई गई
महात्मा गांधी और अंबेडकर के बीच मतभेदों को अक्सर सतही तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यह मतभेद केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक थे। अंबेडकर का मानना था कि केवल सुधार से नहीं, बल्कि संरचना को बदलने से ही समाज में समानता आएगी। वहीं गांधीजी छुआछूत के खिलाफ थे, लेकिन जाति व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने के पक्ष में नहीं थे। यह गहरी वैचारिक बहस आज भी प्रासंगिक है, लेकिन इसे अक्सर इतिहास में दबा दिया गया है।
बाबा साहब का सबसे प्रसिद्ध नारा शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने केवल नारा नहीं दिया, बल्कि खुद इसके उदाहरण बने। उन्होंने अपने जीवन में अत्यधिक कठिन परिस्थितियों के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त की और यह साबित किया कि ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है।
अंबेडकर का राष्ट्रवाद अंधभक्ति पर आधारित नहीं था। वे मानते थे कि एक सच्चा राष्ट्र वही है, जहां सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान मिले। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रही, तो राजनीतिक लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जाएगा। आज के समय में यह चेतावनी और भी अधिक प्रासंगिक लगती है। उन्होंने कभी भी भीड़ का हिस्सा बनने की राजनीति नहीं की। उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई और दलितों के लिए स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग की। उनकी यह सोच आज भी भारतीय राजनीति में पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है।
आज देश के सभी राजनीतिक दल अंबेडकर का नाम लेता है, उनकी मूर्तियां लगाता है, लेकिन उनके विचारों को लागू करने में अक्सर पीछे रह जाता है। उनका सपना केवल सामाजिक समानता नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक समानता भी था। आज भी समाज में असमानता, भेदभाव और अन्याय मौजूद है। आज हर कोई कहता है कि हम अंबेडकर के रास्ते पर चल रहे हैं। सच में ऐसा होता, तो देश में इतनी असमानता, अन्याय और भेदभाव क्यों होता? मूर्ति पर फूल चढ़ाना आसान है, लेकिन उनके विचारों को अपनाना मुश्किल है।
बाबा साहब अंबेडकर का जीवन एक अधूरी क्रांति की कहानी है। उन्होंने जो बीज बोए, वे आज भी फल दे रहे हैं, लेकिन उनका पूरा सपना अभी भी अधूरा है। जरूरत इस बात की है कि हम उन्हें केवल एक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक विचारधारा के रूप में समझें। उनके अनछुए पहलुओं को सामने लाएं और उन्हें अपने जीवन में लागू करें। क्योंकि आंबेडकर केवल इतिहास नहीं हैं, वे वर्तमान और भविष्य दोनों हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विजय शंकर नायक।
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