एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए देशभर में मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग नेटवर्क बनाने की घोषणा की है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह कदम राहत देने वाला हो सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या केवल ऑनलाइन कोचिंग से शिक्षा में बराबरी आ जाएगी। उक्त विचार ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ) रांची जिलाध्यक्ष एहतेशाम परवीन के है।
एआईएसएफ जिलाध्यक्ष एहतेशाम ने स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को कहा कि भारत में पहले से दीक्षा, स्वयं, पीएम ईविद्या और साथी जैसे सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। कहा कि साथी पर 15 लाख से अधिक विद्यार्थी पंजीकृत हैं। ऐसे में नई घोषणा से पहले यह पूछा जाना जरूरी है कि मौजूदा व्यवस्था को मजबूत क्यों नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 के एनएसओ सर्वे के अनुसार देश के लगभग 27 प्रतिशत विद्यार्थी निजी कोचिंग ले रहे हैं या ले चुके हैं। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 30.7 प्रतिशत है।
एहतेशाम के अनुसार उच्च माध्यमिक स्तर पर निजी कोचिंग का औसत खर्च देशभर में ₹6,384 प्रति विद्यार्थी सालाना था। जी और नीट की तैयारी में फीस के साथ हॉस्टल, खाना, यात्रा और अध्ययन सामग्री का खर्च अलग से जुड़ता है। कहा कि सरकार ऑनलाइन कोचिंग मुफ्त कर सकती है, लेकिन मोबाइल, लैपटॉप, इंटरनेट और बिजली सभी छात्रों के लिए मुफ्त नहीं है। कहा कि जिन छात्रों के पास स्मार्टफोन नहीं है, इंटरनेट कमजोर है या घर में पढ़ने के लिए उचित जगह नहीं है, उनके लिए ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच सीमित रहेगी।
उन्होंने कहा कि साथी ऐप को शिक्षा मंत्रालय और आइआईटी कानपुर ने वर्ष 2023 में शुरू किया था। यह जी, नीट, कंबाइन यूनिवर्षिटी इंट्रेस टेस्ट (सीयूइटी), एसएससी और बैंकिंग जैसी परीक्षाओं की मुफ्त तैयारी उपलब्ध कराता है। इसलिए सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रस्तावित नई व्यवस्था साथी से अलग क्या करेगी? अगर वही काम दोबारा किया जाना है, तो नया ढांचा बनाने के बजाय मौजूदा प्लेटफॉर्म को मजबूत करना ज्यादा बेहतर होगा।
एआईएसएफ जिलाध्यक्ष एहतेशाम ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षा में सफलता केवल ऑनलाइन लेक्चर देखने से नहीं मिलती। छात्रों को अच्छे शिक्षक, नियमित टेस्ट, शंका समाधान, मेंटरिंग, व्यक्तिगत रणनीति और लगातार मूल्यांकन की जरूरत होती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ये सुविधाएँ सिर्फ बड़े शहरों में नहीं, बल्कि गांव और छोटे कस्बों के छात्रों तक भी पहुँचे। कहा कि लाखों छात्रों का पंजीकरण उपलब्धि हो सकता है, लेकिन पंजीकरण सफलता का प्रमाण नहीं है। सरकार को बताना चाहिए कि कितने छात्र नियमित रूप से पढ़ रहे हैं, कितने पाठ्यक्रम पूरा कर रहे हैं और कितने जी, नीट, सीयूइटी तथा अन्य परीक्षाओं में सफल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुफ्त कोचिंग आर्थिक बोझ कम कर सकती है, लेकिन सीमित सीटों और बेरोजगारी की समस्या खत्म नहीं कर सकती। कहा कि जी, नीट और सरकारी नौकरियों में लाखों युवा सीमित अवसरों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
इसलिए सरकार को कोचिंग के साथ-साथ सीटों में वृद्धि, रोजगार, भर्ती प्रक्रिया और परीक्षा व्यवस्था में सुधार पर भी ध्यान देना चाहिए। कहा कि मुफ्त कोचिंग स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे शिक्षा की पूरी समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता। देश में डिजिटल शिक्षा का बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद है। जरूरत है मजबूत सरकारी स्कूल, सस्ती उच्च शिक्षा, पर्याप्त सीटें, गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, डिजिटल समानता और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था की। उन्होंने कहा कि मुफ्त शिक्षा का मतलब केवल मुफ्त वीडियो नहीं है। मुफ्त शिक्षा का मतलब है सभी छात्रों को बराबर कस अवसर प्रदान करना। तभी इसकी सार्थकता सामने आएगी।
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