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दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यकों वोट का नरसंहार लोकतंत्र की हत्या की साजिश-नायक

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। केंद्र सरकार द्वारा चलाया जा रहा एसआईआर नहीं, यह लोकतंत्र पर सर्जिकल स्ट्राइक है। देश के दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यकों के वोट का नरसंहार कर लोकतंत्र की हत्या की साजिश है। उक्त बाते झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय शंकर नायक ने 28 अप्रैल को एक विज्ञप्ति के माध्यम से कही।

नायक ने कहा कि झारखंड की जनता को सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि यह समय सामान्य नहीं है। यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया या चुनाव की नियमित तैयारी नहीं है। यह उस बुनियाद पर हमला है, जिस पर लोकतंत्र खड़ा है। आपका वोट, आपका अधिकार और आपकी आवाज। कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (सर) के नाम पर जो प्रक्रिया चलाई जा रही है, वह सतही तौर पर मतदाता सूची के सुधार की कवायद लग सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत और सामने आ रहे आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां करते हैं।

नायक के अनुसार आरोप है कि यह पूरी कवायद एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत बड़े पैमाने पर वैध मतदाताओं को सूची से बाहर करने का प्रयास किया जा रहा है। अगर ऐसा है, तो यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं, यह लोकतंत्र के मूल अधिकार पर सीधा हमला है। यह शुद्धिकरण नहीं, बल्कि वोटर दमन, चुनावी हेरफेर और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की गंभीर आशंका है।

कांग्रेसी नेता नायक के अनुसार देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आए आंकड़े इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार फेज-II सर के दौरान लगभग 7.2 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जबकि केवल करीब 2 करोड़ नए नाम जोड़े गए, यानी नेट 5.2 करोड़ मतदाताओं की कमी, जो कुल का लगभग 10 प्रतिशत से अधिक बैठती है। कहा कि यह आंकड़ा किसी भी सामान्य पुनरीक्षण प्रक्रिया से कहीं ज्यादा बड़ा है। यह सिर्फ एक तकनीकी सुधार नहीं लगता, बल्कि एक व्यवस्थित पैटर्न की ओर इशारा करता है।

उन्होंने कहा कि प्राप्त रिपोर्ट्स के अनुसार जिन राज्यों में डिलीशन प्रतिशत ज्यादा देखा गया, उनमें उत्तर प्रदेश लगभग 13 प्रतिशत से अधिक, गुजरात लगभग 13 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ लगभग 11 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल लगभग 10 प्रतिशत से अधिक शामिल है। वहीं दूसरी ओर केरल लगभग 2.5 प्रतिशत, राजस्थान लगभग 5.4 प्रतिशत, मध्य प्रदेश लगभग 5.7 प्रतिशत शामिल है। सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ संयोग है या यह किसी विशेष चुनावी गणित और रणनीति का हिस्सा है? अगर एक ही प्रक्रिया अलग-अलग राज्यों में इतनी असमानता के साथ लागू होती है, तो पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नायक के अनुसार झारखंड की स्थिति विशेष रूप से गंभीर दिखाई देती है। राज्य में कुल मतदाता लगभग 2.65 करोड़ हैं। सर की शुरुआती प्रक्रिया में लगभग 12 लाख नामों को संदिग्ध श्रेणी में डाला गया है। लगभग 71 लाख मतदाताओं की स्थिति अभी भी जांच या मैपिंग में लंबित बताई जा रही है और 6.7 लाख से अधिक त्रुटियां चिन्हित की गई है। अगर राष्ट्रीय स्तर पर सामने आए 10 प्रतिशत से अधिक डिलीशन का पैटर्न झारखंड में लागू होता है, तो 25 से 27 लाख मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं।

यह सिर्फ एक संख्या नहीं यह लाखों परिवारों, गांवों और समुदायों की राजनीतिक भागीदारी का सवाल है। यह तय करेगा कि आने वाले चुनाव में किसकी आवाज सुनी जाएगी और किसकी चुप कर दी जाएगी। कहा कि जमीनी स्तर पर जो आरोप और रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं, वे बेहद गंभीर हैं। कहा जा रहा है कि आदिवासी बहुल इलाके, दलित बस्तियां, अल्पसंख्यक समुदाय, गरीब और प्रवासी वर्ग इन क्षेत्रों में मतदाताओं को अनुपस्थित, डुप्लिकेट या स्थानांतरित बताकर सूची से बाहर किया जा रहा है। अगर यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं यह चयनात्मक बहिष्करण (सेलेक्टिव एक्सक्लुशन) होगा।

यह लोकतांत्रिक अधिकार छीनने की सुनियोजित प्रक्रिया मानी जाएगी नायक ने बताया कि रिपोर्ट्स के अनुसार, बूथ स्तर पर भी कई असामान्य गतिविधियां देखी जा रही हैं। बूथ लेवल एजेंट्स (बीएलए) की अत्यधिक सक्रियता, चुनिंदा इलाकों में ज्यादा सख्त जांच, दस्तावेजों के नाम पर मतदाताओं को परेशान करना यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाता है, जिसमें सबसे कमजोर वर्ग सबसे पहले सिस्टम से बाहर हो जाता है। जिनके पास संसाधन कम हैं, जानकारी कम है या दस्तावेज पूरे नहीं हैं। वे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

उन्होंने कहा कि यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है कि जब झारखंड में जल, जंगल और जमीन के मुद्दे गरम हैं, आदिवासी अधिकार राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं, चुनावी मुकाबला कड़ा माना जा रहा है, तब अचानक इतनी आक्रामक सर प्रक्रिया क्यों? यह टाइमिंग अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। कहा कि लोकतंत्र में न केवल प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए। जब समय और तरीके दोनों संदेह पैदा करें, तो भरोसा कमजोर होता है। कहा कि अगर मतदाता सूची को ही इस स्तर पर प्रभावित किया जाता है, तो चुनाव का पूरा अर्थ बदल जाता है। चुनाव परिणाम पहले ही प्रभावित हो सकते हैं। जनता की भूमिका सीमित हो जाती है। लोकतंत्र केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का मतलब केवल वोट डालना नहीं है। लोकतंत्र का मतलब है हर योग्य नागरिक का वोट बने रहना। यह समय चुप रहने का नहीं है। अगर आप जागरूक नहीं रहे, तो आपका नाम सूची से हट सकता है। आपका वोट बेअसर हो सकता है। आपकी आवाज दब सकती है। इसके लिए तुरंत अपना नाम मतदाता सूची में जांचें, बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) से संपर्क करें। किसी भी त्रुटि या नाम हटने पर तुरंत आपत्ति दर्ज करें। अपने परिवार, गांव और समाज को जागरूक करें। यह सिर्फ व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं यह सामूहिक लोकतांत्रिक कर्तव्य है।

नायक के अनुसार सर प्रक्रिया आवश्यक हो सकती है, लेकिन इसकी पारदर्शिता, निष्पक्षता और समानता पर सवाल उठ रहे हैं। अगर यह प्रक्रिया संतुलित और न्यायपूर्ण नहीं रही, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर कर सकती है। आज जरूरत है सजग रहने की, सवाल पूछने की और अपने अधिकार की रक्षा करने की। यह सिर्फ सर नहीं, यह अधिकार बनाम सत्ता की लड़ाई है। अगर आज आपने अपने वोट को नहीं बचाया, तो कल आपके पास बोलने का अधिकार भी कमजोर हो सकता है। वोट बचाओ लोकतंत्र बचाओ। जागरूक मतदाता ही मजबूत लोकतंत्र है। सर नहीं यह आपके अधिकारों की परीक्षा है।

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