एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। आज का भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ वैश्विक अस्थिरता, युद्ध जैसे हालात और आर्थिक दबावों का सीधा असर आम जनों के जीवन पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है, बल्कि विकासशील देशों की आंतरिक आर्थिक स्थिति को भी अस्थिर कर दिया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। किंतु सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि इन संकटों के बीच देश की सत्ता में बैठी सरकार किस प्रकार प्रतिक्रिया दे रही है? क्या वह जनता को राहत देने का प्रयास कर रही है या इन आपदाओं में अवसर खोजकर अपनी नीतियों को आगे बढ़ा रही है?
उक्त बातें झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता विजय शंकर नायक ने 23 मार्च को कही। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय में यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि वर्तमान सरकार, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संकट की घड़ी में भी राजनीतिक लाभ की संभावनाएँ तलाशने में अधिक सक्रिय है। उन्होंने कहा कि यह आरोप यूँ ही नहीं उठता, बल्कि इसके पीछे ठोस परिस्थितियाँ और अनुभवजन्य सच्चाइयाँ हैं, जिनका सामना देश की आम जनता रोजमर्रा के जीवन में कर रही है।
नायक ने कहा कि महंगाई आज देश की सबसे ज्वलंत समस्या बन चुकी है। पिछले दो हफ्तों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में जिस प्रकार से वृद्धि देखी गई है, उसने आम देशवासियों की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है। रसोई गैस सिलेंडर, पेट्रोल-डीजल, खाद्य तेल, सब्जियाँ, अनाज लगभग हर आवश्यक वस्तु की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। कहा कि यह केवल आर्थिक आँकड़ों का खेल नहीं, बल्कि यह उस वास्तविकता का चित्रण है जिसे हर घर, हर परिवार, हर देशवासी महसूस कर रहा है। कहा कि एक मजदूर जिसकी दैनिक आय सीमित है, उसके लिए अब दो वक्त की रोटी जुटाना भी चुनौती बन गया है। एक मध्यम वर्गीय परिवार, जो अपने बच्चों की शिक्षा और घर के खर्चों को संतुलित करने की कोशिश करता है, वह भी इस बढ़ती महंगाई के बोझ तले दबता जा रहा है।
नायक के अनुसार सरकार की ओर से अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि वैश्विक स्तर पर युद्ध और आर्थिक संकट के कारण महंगाई बढ़ रही है। निश्चित रूप से, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएँ और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक महंगाई को प्रभावित करते हैं। सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या सरकार ने इन परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम उठाए हैं? क्या यह संभव नहीं था कि सरकार समय रहते आवश्यक वस्तुओं पर नियंत्रण के उपाय करती? क्या यह जरूरी नहीं था कि आम जनता को राहत देने के लिए करों में कमी की जाती या सब्सिडी के माध्यम से राहत प्रदान की जाती? उन्होंने कहा कि जब संकट वैश्विक है, तो समाधान भी संवेदनशील और जनहितकारी होना चाहिए।
नायक ने कहा कि भाजपा सरकार की नीतियों पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे जनहित से अधिक राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। चुनावी समय में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जब जनता को वास्तविक राहत की आवश्यकता होती है, तब नीतियाँ कठोर और जनविरोधी प्रतीत होती हैं। कहा कि महंगाई के इस दौर में भी सरकार की प्राथमिकताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। एक ओर जहां आम जनता महंगाई से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर बड़े कॉरपोरेट घरानों को कर में छूट और अन्य सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। यह असंतुलन समाज में असमानता को और बढ़ाता है।
उन्होंने कहा कि महंगाई का सबसे ज्यादा असर समाज के कमजोर वर्ग पर पड़ता है। गरीब, दलित, आदिवासी और मजदूर वर्ग पहले से ही सीमित संसाधनों में जीवन यापन करते है। जब आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो इन वर्गों के लिए जीवन और भी कठिन हो जाता है। राशन की दुकानों पर लंबी कतारें, रोजगार के अवसरों की कमी और बढ़ती बेरोजगारी आदि सभी समस्याएँ एक साथ मिलकर गंभीर सामाजिक संकट का रूप ले रही हैं। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह इन वर्गों को विशेष राहत प्रदान करे। कहा कि मध्यम वर्ग को अक्सर देश की आर्थिक रीढ़ कहा जाता है, लेकिन आज यही वर्ग सबसे ज्यादा दबाव में है। न तो उसे गरीबों की तरह सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिलता है, और न ही वह अमीर वर्ग की तरह आर्थिक रूप से सुरक्षित है।
नायक के अनुसार देश में बढ़ती महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत तथा स्थिर आय इन सभी कारणों से मध्यम वर्ग की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। यह वर्ग अब अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। नायक ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वह जनता के प्रति जवाबदेह रहे। संकट के समय में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। जनता यह उम्मीद करती है कि सरकार उसकी समस्याओं को समझेगी और उनके समाधान के लिए ठोस कदम उठाएगी। लेकिन, जब सरकार इन समस्याओं को नजरअंदाज करती है या उन्हें कम करके आंकती है, तो जनता में असंतोष बढ़ता है। यह असंतोष धीरे-धीरे एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि महंगाई पर नियंत्रण के लिए सरकार को कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है, जिसमें आवश्यक वस्तुओं पर मूल्य नियंत्रण, पेट्रोल-डीजल पर करों में कमी, गरीबों के लिए सब्सिडी और राहत पैकेज, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करना आदि उपायों के माध्यम से ही जनता को राहत दी जा सकती है।
नायक ने कहा कि आज देश एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वैश्विक संकट हैं, तो दूसरी ओर आंतरिक चुनौतियाँ। ऐसे समय में सरकार की भूमिका निर्णायक होती है। यदि सरकार जनता के हित में काम करती है, तो वह इन चुनौतियों को अवसर में बदल सकती है। लेकिन यदि वह केवल राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देती है, तो यह देश के लिए घातक साबित हो सकता है। कहा कि महंगाई केवल एक आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता से भी जुड़ी हुई है। यदि इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह समय है जब सरकार को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा और ठोस कदम उठाने होंगे। कहा कि जनता अब जागरूक है और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने के लिए तैयार है।
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