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शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा बिहार दिवस पर बेटी पढ़े समाज बढ़े नाटक का मंचन

एस. पी. सक्सेना/पटना (बिहार)। बिहार दिवस के अवसर पर 24 मार्च को बिहार शिक्षा परियोजना परिषद द्वारा राजधानी पटना के गांधी मैदान में लोक पंच की प्रस्तुति बेटी पढ़े समाज बढ़े नाटक का मंचन किया गया। जानकारी नाटक के निर्देशक प्रसिद्ध टीवी कलाकार मनीष महिवाल ने दी।

महिवाल के अनुसार नाटक बेटी पढ़े समाज बढ़े के कथासार में अभिभावकों द्वारा लड़के लड़कियों में असमानता रखने वाले दृष्टिकोंण को दर्शाया गया है। दिखाया गया है कि कैसे मां-बाप अपनी बेटियों को पढ़ाने लिखाने के बजाय उनकी शादी – ब्याह कर अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने में लगे रहते है।

नाटक मे दिखाया गया है कि अगर लड़कियों को सही ढंग से शिक्षा-दीक्षा और मार्गदर्शन मिले तो वह समाज में एक मिसाल कायम कर सकती हैं। इस नाटक में बताया गया है कि मुनिया जो बच्ची यानी नाबालिग है, वह अपने माता-पिता से अनुरोध करती है कि अभी उसका ब्याह ना करें तथा पढ्ने- लिखने की इजाजत दें, फिर भी मुनिया को शादी के मंडप पर बैठा दिया जाता है। महिला शिक्षा तथा नारी सशक्तिकरण इस नाटक का मुख्य उद्देश्य है।

उक्त नाटक का लेखन नीरू कुमारी ने किया है। यह नाटक उन तथाकथित पर कटाक्ष करता है, जो लिंग भेद करते हैं। बेटे को बेटी से श्रेयस्कर मानते हैं और बेटी के साथ पक्षपात करते हैं। इस नाटक में विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से यह समझाने की कोशिश की गई है कि नारी की उपयोगिता नर से कत्तई कम नहीं है। बल्कि उससे कहीं अधिक है। क्योंकि वह जन्म देने का काम करती है। वंश को आगे बढ़ाने का काम करती है और मानव जाति को कायम रखने के लिए अनिवार्य तत्व है। बेटियों के अंदर भी इच्छाएँ होती है कि वे पढ़-लिखकर आगे बढ़े। अपने माता पिता और परिवार का नाम रोशन करे और एक सफल जीवन जिए।

परंतु वास्तविक जीवन में अभिभावक बेटियों को बस नाम मात्र का पढ़ाना चाहते है और घर के काम काज सिखाने में अधिक तत्पर रहते हैं, ताकि उनकी शादी में बाधा न आए। आम सोंच के अनुसार सदियों से यह मानना है कि बेटा वंश को बढ़ाता है, चिता में आग देता है और बुढ़ापे में माता- पिता की सेवा करता है। परंतु आज के परिपेक्ष्य में यह बात गलत मालूम पड़ती है, जब बेटे माँ बाप को छोड़कर अपनी पत्नियों के साथ दूसरे शहर में बस जाते है। कई बेटे तो अपने माँ- बाप का अपमान करते हैं। उन्हें प्रताड़ित करते है और घर से निकाल तक देते हैं। जबकि, बेटियाँ माँ बाप का हाल चाल लेती है। गाहे बगाहे उनकी मदद करती है और अंत तक उनकी सेवा को प्रस्तुत रहती है। प्रस्तुत नाटक इन सच्चाईयों से रू-ब-रू कराने का एक प्रयास है।

प्रस्तुत नाटक में कलाकार रजनीश पांडेय, रोहित कुमार, अरबिंद कुमार, दीपा दीक्षित, सोनल कुमारी, अजीत कुमार, हर्ष दीप, नीलम, राम प्रवेश, अभिषेक राज एवं मनीष महिवाल ने अपने-अपने किरदार को बेहतर ढंग से निभाते हुए दर्शकों की जमकर तालियां बटोरी।

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