एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय शंकर नायक ने केंद्रीय जांच एजेंसियों पर सवाल खड़े किए है। उन्होंने सवालिया निशान लगाते हुए कहा है कि क्या जांच एजेंसियां निष्पक्ष है या भाजपा के राजनीतिक औजार के तौर पर कार्य कर रही है।
नायक ने कहा है कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएं मानी जाती हैं। जिसमें न्यायपालिका, चुनाव आयोग और जांच एजेंसियां शामिल है। इन संस्थाओं की निष्पक्षता ही आमजनों के विश्वास की नींव है, लेकिन भाजपा के केंद्र में सत्ता में आने के बाद हाल के वर्षों में एक गंभीर बहस तेजी से उभरी है कि क्या देश की जांच एजेंसियां वास्तव में स्वतंत्र हैं, या वे भाजपा की केंद्र सरकार के राजनीतिक प्रभाव में काम कर रही हैं?
नायक ने कहा कि इस प्रश्न को बल मिला बीते 3 अप्रैल को प्रकाशित एक विस्तृत खोजी रिपोर्ट से। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि वर्ष 2014 के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे कई विपक्षी नेता जब सत्तारूढ़ दल या उसके सहयोगी गठबंधन में शामिल हुए, तो उनके खिलाफ चल रही जांच की रफ्तार धीमी पड़ गई या उन्हें राहत मिल गई। इस रिपोर्ट को द वायर लाइव मिंट और फाइनेंसियल एक्सप्रेस जैसे अन्य मीडिया संस्थानों ने भी प्रमुखता से उठाया।
उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 से 2024 के बीच 25 ऐसे प्रमुख नेता चिन्हित किए गए जो पहले भ्रष्टाचार या मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में जांच के दायरे में थे। इनमें से 23 नेताओं को बाद में किसी न किसी रूप में राहत मिलती दिखी। कुछ मामलों में जांच ठंडी पड़ गई, तो कुछ में कार्रवाई धीमी हो गई। यद्यपि इन निष्कर्षों की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं हो सकती हैं, लेकिन यह आंकड़ा अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
नायक ने कहा कि जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठना नया नहीं है। इडी (इनफ़ोर्समेंट डायरेक्टरेट) और सीबीआई (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन) जैसे संस्थानों पर समय-समय पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में इन एजेंसियों द्वारा दर्ज किए गए अधिकांश हाई-प्रोफाइल मामले विपक्षी नेताओं से जुड़े रहे हैं। इससे यह धारणा बनती है कि कार्रवाई का दायरा असंतुलित हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इडी के डेटा के अनुसार वर्ष 2014 के बाद 95 प्रतिशत केस विपक्षी नेताओं के खिलाफ वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 98 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा और सबसे चौंकाने वाली बात वर्ष 2015 से 2025 तक में 193 केस, लेकिन केवल 2 दोषसिद्धि यानी 99 प्रतिशत केस या तो दब गए, या लटके रहे।
नायक के अनुसार महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार पर सिंचाई घोटाला, केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल पर मनी लॉन्ड्रिंग केस, असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा पर चिटफंड घोटाला, बंगाल के भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी पर नारदा केस भाजपा चेहरा को उजागर कर रहा है। उन्होंने कहा कि कई नेता सत्ता के लिए विचारधारा बदलते रहे और भाजपा के वॉशिंग मशीन से साफ होकर मंत्री बन गए जो लोकतंत्र पर सीधा हमला है। कहा कि जब जांच एजेंसियां सीबीआई, इडी राजनीतिक हथियार बन जाए, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। यह सिर्फ नेताओं की कहानी नहीं है। यह पूरे सिस्टम का संकट है।
नायक के अनुसार समय समय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार इडी के दुरुपयोग पर सवाल उठाए। लेकिन क्या बदला? सिस्टम वही, पैटर्न वही, परिणाम वही पहले सीबीआई पर आरोप, अब ईडी पर सवाल। कभी सीबीआई को सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन कहा जाता था, आज भाजपा ब्यूरो कहा जाने लगा है। क्या हम सच में एक निष्पक्ष लोकतंत्र में जी रहे हैं? उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि नेता भ्रष्ट हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि कानून असमान हो गया है, विपक्ष मतलब सजा, सत्ता मतलब सुरक्षा। यह लोकतंत्र नहीं, यह सत्ता का दुरुपयोग है। भ्रष्टाचारी पकड़े जा रहे हैं लेकिन हकीकत यह कि भ्रष्टाचारी सत्ता में शामिल होकर बच रहे हैं।
नायक ने कहा कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी जांच एजेंसी की कार्रवाई को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। भ्रष्टाचार के मामलों में जांच होना आवश्यक है। यदि किसी पर गंभीर आरोप हैं तो कानून को अपना काम करना चाहिए। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब कार्रवाई के पैटर्न में असमानता दिखाई देने लगती है। यानी कुछ मामलों में तेजी और कुछ में ठहराव।
उन्होंने कहा कि राजनीति में दल-बदल कोई नई घटना नहीं है। भारतीय राजनीति के इतिहास में अनेक नेता समय-समय पर अपने राजनीतिक रुख बदलते रहे हैं। लेकिन जब दल-बदल और कानूनी राहत के बीच एक संबंध स्थापित होता हुआ प्रतीत हो, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय बन जाता है। इस संदर्भ में अजित पवार , हिमंता बिस्वा सरमा और सुवेंदु अधिकारी जैसे कुछ प्रमुख उदाहरण अक्सर चर्चा में आते हैं, जहां राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ जांच की स्थिति में भी बदलाव देखा गया।
दूसरी ओर, लालू प्रसाद यादव, मोहम्मद आज़म खान एवं विपक्षी दलो के नेताओ के उदाहरण भी सामने रखे जाते हैं, जहां कानूनी मामलों का लंबा सिलसिला जारी रहा और उन्होंने राजनीतिक समझौते का रास्ता नहीं चुना। नायक ने कहा कि इन विपरीत उदाहरणों से यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या कानून का अनुपालन सभी के लिए समान रूप से हो रहा है। इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे आम जनता के मन में क्या संदेश जाता है। यदि यह धारणा बनती है कि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव के लिए किया जा रहा है, तो इससे संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर होती है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं में विश्वास से चलता है।
कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली को लेकर टिप्पणियां की हैं और निष्पक्षता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्थागत सुधार की आवश्यकता को भी दर्शाता है। आज जरूरत है न्यायिक प्रक्रिया को तेज और निष्पक्ष बनाना, ताकि मामलों का समयबद्ध निपटारा हो सके। इसके अतिरिक्त, राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल विपक्ष या सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे राजनीतिक तंत्र की सामूहिक जिम्मेदारी है। कहा कि हम सब को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता के पास होती है।
जनता का विश्वास ही किसी भी सरकार और संस्था की वास्तविक पूंजी है। यदि यह विश्वास कमजोर होता है, तो उसका प्रभाव पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है। इसलिए वॉशिंग मशीन जैसे आरोपों को केवल राजनीतिक नारे के रूप में खारिज करने के बजाय, उन्हें एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। एक ऐसी चेतावनी, जो हमें अपनी संस्थाओं को और अधिक मजबूत, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करती है। क्या भ्रष्टाचार मुक्त भारत केवल एक नारा बनकर रह गया है? या सच में भ्रष्टाचार के खिलाफ समान और निष्पक्ष कार्रवाई हो रही है?
उन्होंने कहा कि अगर कानून का असर व्यक्ति की राजनीतिक स्थिति के आधार पर बदलता दिखाई दे, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत समानता पर सीधा सवाल खड़ा करता है। कहा कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, लेकिन इस लक्ष्य की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब प्रक्रिया भी उतनी ही निष्पक्ष हो। कहा कि लोकतंत्र में सवाल उठाना विरोध नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। और जवाब देना सत्ता की मजबूरी नही बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। जनता की ताकत ही अंतिम जवाब है। सत्ता बदलती है, लेकिन जनता की ताकत स्थायी है। वोट से जवाब दो, सवाल पूछो, सच को पहचानो। अगर आज हम चुप रहे तो कल न्याय भी चुप हो जाएगा।
![]()













Leave a Reply