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स्वार्थ की मित्रता स्थायी नहीं होता, संकट में साथ देनेवाला ही सच्चा मित्र-लक्ष्मणाचार्य

​श्रीमद्भागवत कथा में कृष्ण-सुदामा मिलन प्रसंग, सुदामा चरित्र से भावुक हुए श्रद्धालु

​अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। तिरहुत प्रमंडल के हद में मुजफ्फरपुर के फिरोजपुर बरियारपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ के छठे दिन 6 जून को यज्ञ परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गयी।

कथा के छठे सत्र में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सारण जिला के हद में हरिहरक्षेत्र सोनपुर के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने सुदामा चरित्र और कृष्ण-सुदामा मिलन के पावन प्रसंग पर विस्तृत प्रकाश डाला। इस दौरान पंडाल में प्रस्तुत की गई कृष्ण-सुदामा मिलन की जीवंत झांकी को देख श्रद्धालु भावविभोर हो गए और पूरा परिसर भक्तिमय तालियों से गूंज उठा।

जगद्गुरु स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कथा प्रसंग में मित्रता की परिभाषा बताते हुए कहा कि आजकल केवल स्वार्थवश मित्र और हितैषी बनते हैं। जहां स्वार्थ समाप्त होता है, वहां शत्रुता शुरू हो जाती है। वास्तव में इस जगत में कोई किसी का स्थाई मित्र नहीं है, यह संसार दुखों का सागर है और सांसारिक मित्र विपत्ति में धोखा देते हैं। लेकिन असली मित्र परमात्मा की है, जो कभी किसी को धोखा नहीं देते।

उन्होंने कहा कि असली मित्र वही है जो आपत्ति और विपत्ति में बिना किसी लोभ के मित्र की सहायता करे। सुदामा की दरिद्रता का रहस्य बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन के परम मित्र थे और एक ही गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करते थे। सुदामा को जब श्रापित चने के रहस्य का पता चला कि जो भी इसे खाएगा वह आजीवन दरिद्र रहेगा, उन्होंने स्वयं भूखा रहकर वह चना खा लिया। सुदामा ने वह चना भगवान श्रीकृष्ण को इसलिए नहीं दिया, ताकि संपूर्ण जगत धनहीन होने से बच जाए। यह सुदामा का अपने मित्र और संसार के प्रति सर्वोच्च त्याग था।

​स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने व्यावहारिक जीवन का दर्शन समझाते हुए कहा कि गरीब और दरिद्र में बड़ा अंतर होता है। गरीब कोई भी हो सकता है, लेकिन वास्तव में दरिद्र वह है जो अपने श्रेष्ठ कर्मों का परित्याग कर देता है। जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति आ जाए, मनुष्य को अपने धर्म और कर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सुदामा अभावों में रहे, लेकिन उन्होंने कभी अपनी अयाचक वृत्ति (किसी से न मांगने का संकल्प) और कर्म का परित्याग नहीं किया।

जब प्रभु देते हैं, तो छप्पर फाड़कर देते हैं-लक्ष्मणाचार्य

कथा को आगे बढ़ाते हुए स्वामी लक्ष्मणाचार्य ने कहा कि पत्नी सुशीला के बार-बार आग्रह पर जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो अपने परम मित्र को आया देख राजाधिराज श्रीकृष्ण दौड़ते हुए आए और उन्हें गले से लगा लिया। प्रभु ने सुदामा के फटे हाल को नहीं देखा, बल्कि उनके प्रेम को देखा और आंसुओं से उनके चरण धोए। सुदामा द्वारा लाए गए कच्चे चावलों (तंदुल) की भेंट को प्रभु ने बड़े चाव से स्वीकार किया और बिना मांगे ही सुदामा को त्रिलोक का ऐश्वर्य और राज-वैभव प्रदान कर दिया। सच है कि भगवान जब भी देते हैं, तो छप्पर फाड़कर देते हैं।

यज्ञ समिति के सदस्यों ने बताया कि 7 जून को इस भव्य श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ की सनातनी रीति-रिवाज और हवन-पूजन के साथ पूर्णाहुति होगी, जिसके बाद विशाल भंडारे (प्रसाद वितरण) का आयोजन किया जाएगा। कथा के छठे दिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों सहित हज़ारों की संख्या में महिला व पुरुष श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित किया।

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