रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में निवास करने वाला कुड़मि समाज अपनी समृद्ध संस्कृति, कृषि परंपरा और प्रकृति प्रेम के लिए जाना जाता है। इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आस्था से जुड़ा पर्व है रहअइन परब।
यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि खेती-किसानी, धरती माँ, बीज संरक्षण और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है।
रहअइन परब मुख्य रूप से खेती के आरंभ से पहले मनाया जाता है। इस पर्व के माध्यम से किसान अच्छी फसल, खेतों की उर्वरता, परिवार की सुख-समृद्धि और प्राकृतिक संतुलन की कामना करते हैं। यह पर्व कुड़मि समाज की उस जीवन शैली को दर्शाता है जिसमें प्रकृति को देवता और धरती को माँ का दर्जा दिया गया है।
रहअइन परब धरती माँ और कृषि संस्कृति का पर्व
कुड़मि समाज सदियों से कृषि आधारित जीवन जीता आया है। उनके लिए खेती केवल जीविका नहीं, बल्कि संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। रहअइन परब इसी सोच को मजबूत करता है। इस दिन किसान खेतों, हल-बैल, बीज और कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। मान्यता है कि धरती माँ की कृपा से ही अन्न उत्पन्न होता है और जीवन चलता है।
इस अवसर पर श्रद्धालू गाँवों में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ एकत्रित होकर पूजा-अर्चना करते हैं। वातावरण में मांदर, नगाड़ा और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती है। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में और पुरुष लोक परिधान में शामिल होकर सामूहिक संस्कृति की खूबसूरत झलक प्रस्तुत करते हैं।
बीज पुन्यहा की अनोखी परंपरा रहअइन परब की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है बीज पुन्यहा।
इस अनुष्ठान में खेती के लिए सुरक्षित रखे गए बीजों की पूजा की जाती है। किसान मानते हैं कि बीज ही आने वाले जीवन और समृद्धि का आधार है। इसलिए बीजों को पवित्र मानकर उनका सम्मान किया जाता है। पूजा के दौरान धान, मड़ुआ, मक्का और अन्य फसलों के बीजों को साफ कर पूजा स्थल पर रखा जाता है। गांव के बुजुर्ग या पुजारी पारंपरिक मंत्रों और रीति-रिवाजों के साथ पूजा संपन्न कराते हैं। इसके बाद बीजों को खेतों में बोने की प्रक्रिया शुभ मानी जाती है।
यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि कृषि विज्ञान और बीज संरक्षण की प्राचीन समझ को भी दर्शाती है। कुड़मि समाज सदियों से अपने पारंपरिक बीजों को संरक्षित करने की परंपरा निभाता आया है। भूत, पीड़ा, पूजा और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की मान्यता रहअइन परब में भूत पीड़ा पूजा का भी विशेष महत्व होता है। लोकमान्यता के अनुसार खेती और परिवार को बुरी शक्तियों, रोगों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए यह पूजा की जाती है। ग्रामीण रहिवासी सामूहिक रूप से पूजा कर अपने खेतों और पशुधन की रक्षा की कामना करते हैं। कई स्थानों पर पारंपरिक बलि प्रथा या प्रतीकात्मक अनुष्ठान भी देखने को मिलते हैं।
इस पूजा का उद्देश्य समाज में भय फैलाना नहीं, बल्कि प्रकृति और अदृश्य शक्तियों के प्रति सम्मान एवं संतुलन बनाए रखने की लोकमान्यता को जीवित रखना है। कुड़मि समाज में पूर्वजों को परिवार और समाज का मार्गदर्शक माना जाता है। रहअइन परब के दौरान पूर्वजों को याद कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। मान्यता है कि पूर्वजों की कृपा से परिवार और खेती सुरक्षित रहती है। गांवों में बुजुर्ग नई पीढ़ी को परंपराओं, खेती की विधियों और सांस्कृतिक मूल्यों की जानकारी देते हैं। यही कारण है कि रहअइन परब केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संकट और पारंपरिक कृषि के खत्म होने जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब रहअइन परब जैसी परंपराएं प्रकृति संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश देती हैं। यह पर्व सिखाता है कि धरती केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदायिनी माँ है। बीज केवल अनाज नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही समृद्धि संभव है।
तेजी से बदलती जीवन शैली और आधुनिकता के बावजूद कुड़मि समाज आज भी रहअइन परब को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाता है। गांवों में यह पर्व सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान को जीवित रखने का माध्यम बना है। नई पीढ़ी भी अब सोशल मीडिया और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए अपनी लोक परंपराओं को दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है। यही वजह है कि रहअइन परब केवल गांवों तक सीमित नहीं, बल्कि अब सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनता जा रहा है।
रहअइन परब कुड़मि समाज की उस जीवन दृष्टि का प्रतीक है जिसमें प्रकृति, खेती, पूर्वज और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि विकास और आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों और परंपराओं को बचाए रखना कितना जरूरी है। धरती माँ के प्रति श्रद्धा, बीजों के प्रति सम्मान और प्रकृति के साथ सामंजस्य का यह संदेश आज पूरे समाज के लिए प्रेरणादायक है।
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