एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड की खनिज संपदा कोई केंद्र सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। यह झारखंड की जनता की प्राकृतिक संपदा है और इसके राजस्व पर पहला नैतिक एवं संवैधानिक दावा झारखंड के रहिवासियों का है।
झारखंड प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता विजय शंकर नायक द्वारा बीते 26 अगस्त के सार्वजनिक बयान पर जवाब हेतु राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के नाम खुला पत्र जारी किया है। पत्र में कहा गया है कि रघुवर दासजी पूर्व मुख्यमंत्री झारखंड बीते 26 अगस्त को आपने एमएमडीआर अमेण्डमेंट एक्ट 2026 को झारखंड और देश के हित में बताते हुए कहा कि इससे पारदर्शी खनन, निवेश और राजस्व बढ़ेगा तथा लगभग 90 प्रतिशत खनन कर एवं वैधानिक भुगतान राज्यों को ही मिलते रहेंगे। आपकी बात का पहला हिस्सा ही अधूरा है और दूसरा हिस्सा असली सवाल को छिपाता है।
पहला सवाल यह कि यदि 90 प्रतिशत राजस्व राज्यों का है, तो राज्य के अपने कराधिकार पर रोक क्यों? केंद्र सरकार स्वयं स्वीकार करती है कि लगभग 90 प्रतिशत खनन राजस्व राज्यों को मिलता है। लेकिन एमएमडीआर अमेण्डमेंट एक्ट 2026 की धारा 9डी राज्यों को खनिज अधिकार और खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस अथवा अन्य लेवी लगाने की शक्ति को केंद्रीय सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन कर देती है। यानी सवाल आज मिलने वाले 90 प्रतिशत का नहीं, भविष्य में झारखंड के अपने राजस्व-स्रोत पर अधिकार का है।
दूसरा सवाल यह कि ₹11,000 करोड़ का संभावित राजस्व प्रभाव निवेश के नाम पर कैसे छिपाया जा सकता है? आपने प्रस्तावित लगभग ₹11,000 करोड़ के सेस को केवल राजस्व नुकसान के नजरिये से नहीं देखने की बात कही। लेकिन झारखंड के लिए खनिज राजस्व कोई कागजी आंकड़ा नहीं। इसी पैसे से सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और खनन प्रभावित क्षेत्रों का विकास होता है। राजस्व का अधिकार सीमित करके बाद में निवेश का सपना दिखाना राज्य के वित्तीय हितों का जवाब नहीं है।
तीसरा सवाल यह कि केंद्र के अपने आंकड़े आपके तर्क को कमजोर करते हैं। कोयला मंत्रालय के अप्रैल 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार झारखंड को कोल इंडिया लिमिटेड से अकेले ₹386.66 करोड़ रॉयल्टी, ₹98 करोड़ डीएमएफ और ₹11.76 करोड़ एनएमइटी मिला। इसके अतिरिक्त ₹63.20 करोड़ सीजीएसटी, ₹57.21 करोड़ एसजीएसटी और ₹12.66 करोड़ आईजीएसटी दर्ज है। जब खनिज क्षेत्र इतना बड़ा राजस्व स्रोत है, तो राज्य के अतिरिक्त वैधानिक राजस्व अधिकारों को सीमित करने का जोखिम झारखंड क्यों उठाए?
चौथा सवाल यह कि डीएमएफ का पैसा खर्च नहीं होने का आरोप लगाकर राज्य का अधिकार खत्म करना समाधान नहीं है। आपने डीएमएफ में ₹18,250 करोड़ संग्रह और ₹7,900 करोड़ से अधिक राशि के अप्रयुक्त होने का दावा किया है। यदि यह आंकड़ा सही है तो सरकार से जवाब माँगना आपका अधिकार है। लेकिन डीएमएफ के उपयोग में कमी का समाधान राज्य के खनिज कराधिकार को कमजोर करना नहीं हो सकता। दोनों मुद्दों को मिलाकर जनता को भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।
पाँचवाँ सवाल यह कि खनन ब्लॉकों की संख्या गिनाने से पहले अपनी सरकार के कार्यकाल का हिसाब दीजिए। आपने 34 में केवल 4 कोयला ब्लॉक, 15 में 6 लौह-अयस्क और 37 में 17 बॉक्साइट खदानों के संचालन का दावा किया। यदि संचालन और उत्पादन में कमी समस्या है तो इसका समाधान बेहतर प्रशासन, तेज अनुमति, आधारभूत संरचना और पर्यावरणीय अनुपालन है। राज्य के संवैधानिक वित्तीय अधिकारों को केंद्र के अधीन करना नहीं।
छठा सवाल यह कि आप पारदर्शिता की बात करते हैं, लेकिन असली पारदर्शिता यह है कि झारखंड के खनिज से होने वाली हर आय में राज्य का अधिकार कितना रहेगा। पीआरएस के विधायी विश्लेषण के अनुसार नया प्रावधान राज्यों की खनिज अधिकार एवं खनिज-युक्त भूमि पर कर/सेस लगाने की शक्ति को केंद्रीय शर्तों से जोड़ता है। उसी विश्लेषण में यह संवैधानिक प्रश्न भी उठाया गया है कि खनिज-युक्त भूमि पर राज्य की एंट्री 49 वाली कराधिकार शक्ति और संसद की शक्ति के बीच सीमा क्या है।
रघुवर दासजी, झारखंड की जनता को 90 प्रतिशत का आंकड़ा नहीं, अपने अधिकार की गारंटी चाहिए। खनिज झारखंड की धरती से निकलता है, विस्थापन झारखंड के रहिवासियों का होता है, प्रदूषण झारखंड के गांव झेलते हैं और यदि राजस्व अधिकार भी धीरे-धीरे केंद्र के नियंत्रण में चला गया तो फिर झारखंड के हिस्से में क्या बचेगा?
इसलिए आपसे सीधा सवाल है कि क्या आप सार्वजनिक रूप से यह गारंटी देंगे कि एमएमडीआर अमेण्डमेंट एक्ट 2026 से झारखंड के वर्तमान और भविष्य के किसी भी वैधानिक खनिज राजस्व अधिकार में कमी नहीं होगी? यदि जवाब हाँ है तो इसका स्पष्ट कानूनी प्रावधान बताइए।
यदि जवाब नहीं है तो झारखंड की जनता को बताइए कि आप राज्य के खनिज अधिकारों को सीमित करने वाले कानून का समर्थन किसके हित में कर रहे हैं? झारखंड की खनिज संपदा किसी केंद्र सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। यह झारखंड की जनता की प्राकृतिक संपदा है और इसके राजस्व पर पहला नैतिक एवं संवैधानिक दावा झारखंड के रहिवासियों का है।
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