सांस्कृतिक संगम रामायण का दूसरा दिन रामचरित मानस सर्वश्रेष्ठ आदर्शों की प्रयोगशाला
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। रामचरितमानस एक विलक्षण महाकाव्य है। जिसमें भक्ति, ज्ञान और समाज विज्ञान का मूल तत्व समाहित है। हनुमान जैसे भक्त, भरत जैसे ज्ञानी भाई, सीता जैसी पत्नी, दशरथ जैसे पिता और राम जैसा पुत्र सब के सब सर्वश्रेष्ठ आदर्शों की प्रयोगशाला जैसे दिखते हैं।
सोनपुर मेला में आयोजित रामायण मंचन के दूसरे दिन 23 नवंबर को सारण जिला के हद में हरिहर क्षेत्र मेला में गंगा अवतरण प्रसंग के अंतर्गत भागीरथ की परमार्थिक कठोर तपस्या फलीभूत होकर गंगा को धरती पर आने के लिए विवश करते दिखाया गया। भागीरथ का सर्वहिताय में किया गया यह भागीरथी प्रयास आज भी जनमानस में आदर्श रूप में व्याप्त है।

इसके साथ हीं आज का मुख्य प्रसंग राम विवाह अपने आप में कई संदेश देता है। उस युग में भगवान श्रीराम के क्रांतिकारी विचार कई रूढ़िगत परंपराओं को तोड़ते हैं।
यह सर्वविदित है कि सीताजी महाराज जनक को बाजपेय यज्ञ के समय हल चलाते हुए खेत में नवजात शिशु के रूप में मिली थीं। कुल – गोत्र, मात-पितृ विहीन सीता को श्रीराम ने भार्या के रूप में स्वीकार किया था। यह घटना अपने आप में क्रांतिकारी विचारधारा को प्रतिस्थापित करती है।
वर्तमान समय में नारी स्वतंत्रता विमर्श को लेकर जिस तरह बात हो रही है, अगर हम गौर से देखें तो उस युग में नारी अपने वर को चुनने के लिए पूर्ण स्वतंत्र थी। ऐसे ऐतिहासिक एवं पौराणिक उदाहरण हमारे शास्त्रों में मिल जाएंगे जो उस युग में नारी स्वतंत्रता के दृष्टांत को प्रमाणित रूप में प्रस्तुत करते हैं।

सीता स्वयंवर के अंतर्गत एक और प्रसंग राष्ट्र की एकता और संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए विश्वामित्र की दूर दृष्टि ध्यान देने योग्य है। रावण का बढ़ता प्रभुत्व आर्यावर्त पर संकट के रूप में मंडरा रहा था। अलग अलग राज्यों में बंटा आर्यावर्त रावण के विस्तारवादी अभियान को रोकने में अक्षम् था। इन्हीं परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए विश्वामित्र की दूरदर्शिता ने आर्यावर्त के दो बड़े राज्य अयोध्या और मिथिला को मांगलिक सूत्र में बांधकर एक अखंड आर्यावर्त के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतः रामायण के ये सारे प्रसंग गूढ़ रहस्यों से भरे पड़े हैं।
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