Advertisement

उच्च शिक्षा का बदलता स्वरूप: विदेशी विश्वविद्यालय व् शिक्षा की चुनौती-एहतेशाम

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ) के झारखंड प्रदेश सह सचिव एवं रांची जिलाध्यक्ष एहतेशाम परवीन ने देश में उच्च शिक्षा के बदलते स्वरूप को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने अपने लेख में कहा है कि भारत में उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर से जोड़ने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय नगर (यूनिवर्सिटी टाउनशिप) और विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में परिसर स्थापित करने की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। कहा है कि सरकार का उद्देश्य उच्च शिक्षा, अनुसंधान, कौशल विकास और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है।

एआईएसएफ नेत्री एहतेशाम परवीन ने कहा कि हाल ही में न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय सिडनी (यूएनएसडब्ल्यू) ने कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में अपना परिसर शुरू किया है। इसे भारत में अंतरराष्ट्रीय उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कहा कि इन पहलों के साथ यह भी आवश्यक है कि इनके सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन किया जाए।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय नगर की अवधारणा के तहत केंद्रीय बजट 2026-27 में विश्वविद्यालय नगर की अवधारणा सामने रखी गई है। इसके अंतर्गत केंद्र सरकार राज्य सरकारों के सहयोग से देश के रणनीतिक क्षेत्रों में पाँच विश्वविद्यालय नगर स्थापित करने की योजना बना रही है। इन विश्वविद्यालय नगरों में विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय, अनुसंधान संस्थान, कौशल विकास केंद्र, छात्रावास, आवासीय सुविधाएँ तथा उद्योगों से जुड़ी संस्थाओं को एकीकृत रूप से विकसित किए जाने की परिकल्पना है। इनका उद्देश्य शिक्षा, अनुसंधान, कौशल विकास और उद्योग के बीच मजबूत संबंध स्थापित करना है।

उन्होंने कहा कि न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) ने कर्नाटक के बेंगलुरु में अपना परिसर शुरू किया है। इससे भारतीय विद्यार्थियों को देश में रहते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है। कहा कि प्रारंभिक चरण में यहाँ व्यवसाय, कंप्यूटर विज्ञान, आँकड़ा विज्ञान, साइबर सुरक्षा जैसे विषयों में अध्ययन कराया जाएगा। यह पहल उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है।

लेकिन इसके साथ शिक्षा की सुलभता और वहनीयता का प्रश्न भी जुड़ा है। सवाल यह है कि विदेशी विश्वविद्यालयों और विश्वविद्यालय नगरों के विस्तार से इनका लाभ समाज के सभी वर्गों को समान रूप से मिलेगा या नहीं। यदि इन संस्थानों की शुल्क संरचना बहुत अधिक रही, तो आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी इनसे बाहर हो सकते हैं।

इसलिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा केवल संपन्न वर्ग के विद्यार्थियों तक सीमित न रह जाए। गरीब, ग्रामीण, आदिवासी और मध्यमवर्गीय विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, शुल्क में सहायता और छात्रावास जैसी सुविधाएँ सुनिश्चित की जानी चाहिए।

एहतेशाम के अनुसार देश के अनेक सरकारी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय आज भी शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत संरचना, सीमित अनुसंधान सुविधा, पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं की कमी तथा पर्याप्त वित्तीय संसाधनों का अभाव जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यदि सरकार का अधिकांश ध्यान नए विश्वविद्यालय नगरों और विदेशी विश्वविद्यालयों पर केंद्रित हो गया, तो मौजूदा सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की उपेक्षा हो सकती है। इससे उच्च शिक्षा में दो अलग-अलग स्तर पैदा हो सकते हैं। कहा कि एक ओर आधुनिक सुविधाओं से युक्त विश्वविद्यालय नगर और विदेशी विश्वविद्यालय, दूसरी ओर सीमित संसाधनों वाले सरकारी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय।

एहतेशाम के अनुसार विदेशी और निजी विश्वविद्यालयों के विस्तार से उच्च शिक्षा में प्रतिस्पर्धा और नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ शिक्षा के निजीकरण और व्यावसायीकरण का खतरा भी है। कहा कि शिक्षा को केवल लाभ कमाने वाली व्यवस्था नहीं बनाया जाना चाहिए। विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल रोजगार के लिए विद्यार्थी तैयार करना नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक चेतना और आलोचनात्मक सोच का विकास करना भी है।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय नगरों को औद्योगिक एवं परिवहन गलियारों के निकट स्थापित करने का उद्देश्य उद्योग और शिक्षा के बीच सहयोग बढ़ाना है। यह उपयोगी हो सकता है, लेकिन अत्यधिक औद्योगिक प्रभाव से विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, अनुसंधान की प्राथमिकता, वित्तीय सहायता तथा शैक्षणिक कार्यक्रम पर व्यावसायिक हितों का प्रभाव बढ़ने की आशंका भी है। इसमें विशेष रूप से मानविकी, सामाजिक विज्ञान और मूलभूत अनुसंधान जैसे क्षेत्रों को पर्याप्त महत्व दिया जाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि ग्रामीण और वंचित विद्यार्थियों के सामने चुनौती है कि विश्वविद्यालय नगर मुख्यतः बड़े औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों के आसपास विकसित होने की संभावना है। इससे ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के विद्यार्थियों के सामने दूरी + आवास का खर्च + परिवहन का खर्च + शिक्षण शुल्क जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। इसलिए उच्च शिक्षा का विस्तार केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं होना चाहिए।

छात्र नेत्री एहतेशाम के अनुसार बड़े विश्वविद्यालय नगरों के निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में भूमि की आवश्यकता हो सकती है। यदि भूमि अधिग्रहण उचित मुआवजे, पुनर्वास और स्थानीय रहिवासियों के हितों की रक्षा के बिना किया गया, तो किसानों और स्थानीय समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। इसलिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पारदर्शी, न्यायपूर्ण और जनहित आधारित होनी चाहिए। साथ हीं बड़े शिक्षा एवं औद्योगिक केंद्रों के निर्माण से जल की मांग, यातायात, निर्माण कार्य और कचरे में वृद्धि हो सकती है।

इसलिए विश्वविद्यालय नगरों की स्थापना से पहले पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन, हरित क्षेत्र और कचरा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय नगरों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शिक्षक, शोधकर्ता और कर्मचारी आने से आसपास के क्षेत्रों में मकान का किराया, भूमि की कीमत और दैनिक जीवन का खर्च बढ़ सकता है। इसका सबसे अधिक प्रभाव स्थानीय गरीब और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ सकता है। कहा कि विश्वविद्यालय नगरों की योजना में उद्योग और रोजगार पर विशेष जोर दिया गया है।

लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल उद्योगों को कुशल मानव संसाधन उपलब्ध कराना नहीं होना चाहिए। उच्च शिक्षा को विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्वतंत्र चिंतन, सामाजिक जिम्मेदारी, लोकतांत्रिक चेतना और अनुसंधान की भावना भी विकसित करनी चाहिए।

कहा कि विश्वविद्यालय नगरों के संबंध में सार्वजनिक परामर्श केवल उनके निर्माण और उद्योगों के साथ सहयोग तक सीमित नहीं होना चाहिए। इन प्रश्नों पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए कि क्या गरीब विद्यार्थियों के लिए शिक्षा सस्ती होगी? क्या ग्रामीण और आदिवासी विद्यार्थियों के लिए विशेष अवसर होंगे? क्या सरकारी विश्वविद्यालयों को पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलेगी? क्या विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस पर पर्याप्त पारदर्शिता होगी? क्या स्थानीय रहिवासियों की भूमि और आजीविका सुरक्षित रहेगी? क्या पर्यावरण संरक्षण के ठोस उपाय किए जाएंगे? क्या मानविकी और सामाजिक विज्ञान को पर्याप्त महत्व मिलेगा? क्या विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी?

निष्कर्ष यह कि विश्वविद्यालय नगर और विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसर भारत की उच्च शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर से जोड़ने, अनुसंधान को बढ़ावा देने तथा उद्योग और शिक्षा के बीच सहयोग मजबूत करने में उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन केवल नए विश्वविद्यालयों और आधुनिक परिसरों का निर्माण ही शिक्षा सुधार का मापदंड नहीं हो सकता। सरकारी विश्वविद्यालयों को मजबूत करना, शिक्षा को सस्ता रखना, ग्रामीण और वंचित विद्यार्थियों को समान अवसर देना तथा शिक्षा के व्यावसायीकरण को रोकना भी उतना ही आवश्यक है।

यदि कुछ चुनिंदा शहरों में अत्याधुनिक विश्वविद्यालय विकसित होते हैं और दूसरी ओर ग्रामीण तथा सरकारी महाविद्यालय संसाधनों की कमी से जूझते रहते हैं, तो इससे शिक्षा में सामाजिक और आर्थिक असमानता और गहरी हो सकती है। उन्होंने कहा कि विदेशी विश्वविद्यालयों का भारत में स्वागत हो, लेकिन सरकारी विश्वविद्यालयों की कीमत पर नहीं। विश्वविद्यालय नगर बनें, लेकिन शिक्षा केवल उद्योग की आवश्यकता के लिए नहीं, बल्कि समाज और विद्यार्थियों के अधिकारों के लिए भी हो। कहा कि वैश्विक शिक्षा आवश्यक है, लेकिन समान शिक्षा उससे भी अधिक आवश्यक है।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *