जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का लें संकल्प-मंत्री
आदिवासी संस्कृति को समझने के लिए चेतना व् संवेदना जागृति जरूरी-विधायक
आदिवासियों को दिखाना नहीं, उनसे सीखना व् संस्कृति को समझना है-उपायुक्त
एस. पी. सक्सेना/रंजन वर्मा/बोकारो। बोकारो जिला मुख्यालय स्थित शिबू सोरेन (टाउन हॉल) में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी महोत्सव का आयोजन किया गया। आदिवासी महोत्सव के अवसर पर झारखंड के पेयजल एवं स्वच्छता तथा उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग के मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का संदेश देती है। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण में आदिवासी समाज की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है।
उन्होंने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अधिकारों, पहचान, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के प्रति संकल्प लेने का दिन है। आदिवासी समाज की समृद्ध विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
मंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज ने हमेशा प्रकृति को सम्मान दिया है। आज पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण से सीख लेने की आवश्यकता है। मंत्री ने विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामना देते हुए कहा कि हम सभी मिलकर जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और पर्यावरण के संरक्षण का संकल्प लें तथा झारखंड की समृद्ध आदिवासी विरासत को और मजबूत बनाएं।
बोकारो विधायक श्वेता सिंह ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस का यह मंच केवल मनोरंजन का मंच नहीं है, बल्कि आदिवासी संस्कृति की गरिमा, उसके अर्थ और उसकी आत्मा को समझने का अवसर है। उन्होंने कहा कि आदिवासी शब्द का अर्थ ही आदि से वास करने वाला है। कहा कि मानव सभ्यता की उत्पत्ति से ही प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने की परंपरा रही है। इसमें आदिवासी संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हमें आदिवासी जीवन-पद्धति और संस्कृति के मूल भाव को समझने तथा उसे अपने जीवन में आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आदिवासी परिवेश को केवल देखें नहीं, बल्कि उसके भाव और आत्मा को महसूस करने का प्रयास करें। कहा कि अपने भीतर की चेतना और संवेदना को जागृत करने की आवश्यकता है। भौतिक सुख-सुविधाओं को पाने की कोशिश में हम कहीं न कहीं अपनी जड़ों, संस्कृति और मिट्टी से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में हमें अपनी मूल चेतना और प्रकृति से जुड़ाव को फिर से पहचानने की जरूरत है।
बोकारो जिला उपायुक्त (डीसी) अजय नाथ झा ने कहा कि जब हम आदिवासी समाज की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आदिवासी कौन हैं? आदिवासी अस्मिता क्या है और उनकी पहचान क्या है? इसे जानना और समझना बेहद आवश्यक है। हमें यह भी समझना होगा कि आदिवासी समाज अपने विकास को किस दृष्टिकोण से देखता है, उसकी अपनी इच्छाएं और अपेक्षाएं* क्या हैं। इसलिए जरूरी है कि हम आदिवासी समाज की परंपराओं, संस्कृति और सांस्कृतिक धरोहर को जानें, समझें तथा उनकी सोच एवं गरिमा का सम्मान करते हुए विकास की दिशा तय करें।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को कुछ दिखाने या उन्हें कुछ सिखाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें उनसे सीखने और उनकी जीवनशैली को समझने की आवश्यकता है। जिस विकास की धारा को हम आदिवासी समाज के लिए सही मानते हैं, जरूरी नहीं कि वही उनकी दृष्टि में भी सही हो। उनकी परंपराओं और जीवन मूल्यों को समझना होगा। कहा कि इस प्रकार के आयोजन यह संदेश देते हैं कि बोकारो जिला प्रशासन जिले के विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सभी के विकास के लिए प्रशासन पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है।
आदिवासी महोत्सव में 4,300 एकड़ वन अधिकार पट्टा वितरण
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित बोकारो आदिवासी महोत्सव में वन अधिकार और संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। कार्यक्रम में मंत्री योगेंद्र प्रसाद, चंदनकियारी विधायक उमाकांत रजक और बोकारो विधायक श्वेता सिंह की उपस्थिति रही।
महोत्सव के दौरान जिला के हद में गोमिया और पेटरवार प्रखंड के 6 गांवों को कुल 4,300 एकड़ रिकॉर्ड वन क्षेत्र का सामुदायिक वन अधिकार पट्टा प्रदान किया गया। इसमें चोरगावां गांव को 2,800 एकड़ और गांगपुर गांव को 900 एकड़ भूमि शामिल है। इससे ग्राम सभाओं को वन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग का अधिकार मिला है।

कार्यक्रम में वन सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बोकारो वन प्रमंडल के वन रक्षकों को 5 नए गश्ती वाहन भी सौंपे गए। इससे जंगलों में निगरानी बढ़ेगी और अवैध कटाई व वन्यजीव अपराधों पर नियंत्रण में मदद मिलेगी। यह पहल आदिवासी अधिकारों के संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
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