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विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित पं. शैलेंद्र कुमार पाठक गयाजी घराने के वैश्विक संवाहक

सिद्धार्थ पांडेय/चाईबासा (पश्चिम सिंहभूम)। भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत में बिहार राज्य के गयाजी घराने की समृद्ध विरासत, विशेषकर ध्रुपद और धमार शैली को वैश्विक पटल पर गौरवान्वित करने वाले पंडित शैलेंद्र कुमार पाठक एक अत्यंत प्रतिष्ठित और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार हैं।

ज्ञात हो कि 10 जून 1970 को ईश्वरपुर गया (बिहार) की पावन भूमि पर जन्मे शैलेंद्र कुमार पाठक को संगीत की कला जन्मजात मिली। उन्होंने ध्रुपद, धमार और ठुमरी गायन की कठिन व पारंपरिक शिक्षा अपने पूज्य पिता एवं गुरु, महान संगीत मनीषी पंडित कृष्ण मोहन पाठक के सानिध्य में प्राप्त की। अपनी गहन साधना, गंभीर सुर और मंत्रमुग्ध कर देने वाली गायकी के कारण आज वे संगीत बिरादरी में एक विशिष्ट और सम्मानित स्थान रखते हैं।

संगीत के प्रति उनका समर्पण केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इसमें संगीत प्रवीण की सर्वोच्च शैक्षणिक उपाधि प्राप्त की। अपनी इस अमूल्य विद्या को नई पीढ़ी में संचारित करने के उद्देश्य से वे वर्ष 1990 से लगातार झारखंड की राजधानी रांची के एसआर डीएवी पब्लिक स्कूल पुंदाग में वरिष्ठ संगीत शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। इसके साथ ही, वे देश की ख्यातिप्राप्त संगीत संस्था प्रयाग संगीत समिति प्रयागराज में मुख्य परीक्षक का महत्वपूर्ण दायित्व भी संभाल रहे हैं। आकाशवाणी राँची और दूरदर्शन के वरिष्ठ कलाकारों में शुमार पंडित शैलेन्द्र की कला की गूँज भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रही है।

वर्ष 2018 में उन्होंने हांगकांग में रिनेसां ऑफ राइटर आर्टिस्ट एसोसिएशन (डीएमएस) के मंच पर भारत का गौरवपूर्ण प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद कनाडा (सार्ब अकाल म्यूजिक सोसाइटी) और नेपाल (राजोपाध्याय संगीत प्रतिष्ठान काठमांडू) जैसे देशों में भी उनकी कला को सराहना मिली। राष्ट्रीय स्तर पर वे वाराणसी के ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय ध्रुपद मेला (वर्ष 2023, 2024 और 2025) में लगातार अपनी जादुई प्रस्तुतियाँ देते रहे हैं। साथ ही देश की राजधानी दिल्ली, बिहार की राजधानी पटना और झारखंड के विभिन्न राजकीय महोत्सवों में भी सक्रिय रहे हैं।

अपनी गहरी पारखी नज़र और शास्त्रीय समझ के कारण उन्हें देश के बड़े-बड़े मंचों पर निर्णायक (जूरी मेंबर) के रूप में आमंत्रित किया जाता रहा है, जिनमें आइआईटी कानपुर का अंतराग्नि उत्सव (2011), भारत सरकार का सीसीआरटी तथा एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज के तहत गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी व एमिटी यूनिवर्सिटी में आयोजित नेशनल यूथ फेस्टिवल्स मुख्य हैं।

संगीत की इस अनवरत सेवा के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कलाश्री (2017), ध्रुपद मार्तंड अवार्ड (2022, जम्मू-कश्मीर) और रावा इंटरनेशनल आइकॉन अवार्ड (2021) जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। इसके साथ ही झारखंड के विधानसभाध्यक्ष, स्थानीय सांसदों और विधायकों द्वारा भी उन्हें समय-समय पर विशेष राजकीय प्रशस्ति पत्र भेंट किए गए हैं। वर्तमान में वे रांची के पंडरा को अपना मुख्य केंद्र बनाकर प्राचीन ध्रुपद परंपरा के संरक्षण और संवर्धन में एक सच्चे सांस्कृतिक ध्वजवाहक की भूमिका निभा रहे हैं।

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