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डीपीएस बोकारो में सांख्य सिद्धांत पर कार्यशाला का आयोजन

21वीं सदी की शिक्षा में घुलेगा भारतीय दर्शन का ज्ञान

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। भारतीय दर्शन शास्त्र ऋषियों और मुनियों द्वारा दिया गया ज्ञान का वह अनमोल खजाना है, जो आज की आधुनिक शिक्षा को एक नई दिशा दे सकता है।

इसी विचार के साथ दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) बोकारो के महात्मा गांधी सम्मेलन कक्ष में थ्योरी ऑफ नॉलेज पर 2 मई को एक विशेष क्षमता संवर्धन कार्यशाला का आयोजन किया गया। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) सीओई पटना के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को भारतीय दर्शन के सांख्य सिद्धांत और प्रमाणों से परिचित कराकर शिक्षण पद्धति को और अधिक प्रभावी बनाना था।

इस इंटरैक्टिव सत्र में शिक्षकों ने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक क्लास रूम से जोड़ने के गुर सीखे, जिसका सीधा लाभ विद्यार्थियों को मिल सके। कार्यक्रम की शुरुआत बतौर साधनसेवी (रिसोर्स पर्सन) डीपीएस चास की निदेशक सह प्राचार्य डॉ मनीषा तिवारी ने ध्यान और आत्म-मूल्यांकन गतिविधि के साथ की। उपस्थित शिक्षकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि हम स्वयं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, इसलिए अपनी व्यक्तिगत भलाई को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

ज्ञान अर्जन के मुख्य खंड पर चर्चा करते हुए डॉ तिवारी ने भारतीय दर्शन शास्त्र के छह प्रमाणों- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देकर कहा कि हजारों वर्ष पहले रखे गए ये छह स्तंभ आज की समकालीन शिक्षा और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) के लिए बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने विद्यार्थियों में क्रिटिकल थिंकिंग विकसित किए जाने पर भी बल दिया।

कार्यशाला के द्वितीय साधनसेवी त्रिमूर्ति पब्लिक स्कूल के उप-प्राचार्य अनिल कुमार मोदी ने इन सिद्धांतों की 21वीं सदी के शैक्षिक परिदृश्य में उपयोगिता पर गहन चर्चा की। उन्होंने शिक्षकों को बताया कि कैसे इन माध्यमों से छात्र वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इस अवसर पर सीबीएसई के सिटी कोऑर्डिनेटर एवं डीपीएस बोकारो विद्यालय के प्राचार्य डॉ ए. एस. गंगवार ने थिंकिंग क्लासरूम (सोचने वाली कक्षाएं) विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन शास्त्र के सिद्धांत और अवधारणाएं एनईपी 2020 के साथ मिलकर आधुनिक शिक्षण और सीखने की पहल को एक नया आयाम दे सकते हैं। हमें विद्यार्थियों में ऐसी व्यक्तिगत दृष्टि विकसित करनी होगी, जहां वे सवाल पूछ सकें कि हम जो जानते हैं, वह कैसे जानते हैं? कार्यशाला के दौरान विषय वस्तु से संबंधित विभिन्न प्रकार की गतिविधियां आयोजित की गईं। समापन मूल्यांकन सत्र से किया गया।

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