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दहेज मुक्त आदर्श विवाह की मिसाल: बैलगाड़ी से पहुंचे जनार्दन ने करायी दुल्हन की विदाई

पुरखों की परंपरा, कुड़माली नेगाचारी से विवाह; घोड़ा नाच, मांदर व् लोकधुनों की गूंज

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। आधुनिकता की चकाचौंध, महंगी गाड़ियों, बैंड-बाजों और दहेज की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच बोकारो जिला के हद में कसमार प्रखंड के एक युवा ने अपनी सादगी, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता से पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

जानकारी के अनुसार कसमार प्रखंड के हद में तेलियाडीह टांगटोना रहिवासी शिव महतो के पुत्र जनार्दन कुमार महतो ने मुगों बगदा रहिवासी नागेश्वर महतो की पुत्री श्वेता कुमारी के साथ पूर्णतः दहेज मुक्त आदर्श विवाह कर समाज को एक सशक्त संदेश दिया है। युवा जनार्दन के अनुसार विवाह का आधार धन-दौलत नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान, विश्वास और संस्कार होने चाहिए।

ध्यान देने योग्य यह कि इस विवाह की सबसे अनूठी पहचान रही बैलगाड़ी की बारात। आधुनिक वाहनों के बजाय जनार्दन अपने पूर्वजों की परंपरा को निभाते हुए लगभग पांच किलोमीटर की दूरी बैलगाड़ी से तय कर बारात लेकर मुगों बगदा गांव पहुंचे। विवाह उपरांत दुल्हन श्वेता की विदाई भी उसी बैलगाड़ी से हुई। नवदंपती का यह पारंपरिक सफर ग्रामीणों के लिए भावुक और गर्व का क्षण बन गया।रहिवासियों ने इसे अपनी लोक संस्कृति, ग्रामीण जीवन मूल्यों और विरासत को सहेजने की प्रेरणादायक पहल बताया।

उक्त बारात का पूरा माहौल लोक संस्कृति के रंग में सराबोर रहा। बाराती घोड़ा नाच, मांदर की थाप और कुड़माली लोकधुनों पर नाचते-गाते पैदल ही गांव पहुंचे। पूरे रास्ते पारंपरिक गीतों और वाद्ययंत्रों की मधुर गूंज से वातावरण उत्सवमय बना रहा। गांव के बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग इस अनूठी बारात को देखने उमड़ पड़े। कईयों ने इसे वर्षों बाद देखने को मिली ऐसी पारंपरिक बारात बताया।

विवाह की सभी रस्में कुड़मी समाज की पुरखैनीं कुड़माली नेगाचारी के अनुसार पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ संपन्न हुईं। विवाह समारोह में न तो दिखावे की होड़ थी और न ही फिजूलखर्ची। सादगी, सामाजिक समानता, सांस्कृतिक अस्मिता और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम इस आयोजन में स्पष्ट दिखाई दिया।

विवाह समारोह में उपस्थित ग्रामीणों और समाज के प्रबुद्ध जनों ने नवदंपती को शुभाशीष देते हुए कहा कि आज जब दहेज जैसी कुप्रथा अनेक परिवारों के लिए अभिशाप बन गया है, ऐसे समय में जनार्दन और श्वेता का यह निर्णय समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका मानना है कि यदि युवा पीढ़ी दहेज मुक्त और पारंपरिक मूल्यों पर आधारित विवाह को अपनाए, तो न केवल सामाजिक कुरीतियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा, बल्कि हमारी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराएं भी सुरक्षित रह सकेंगी।

यह विवाह केवल दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि दहेज प्रथा के विरुद्ध एक सामाजिक संदेश, लोक संस्कृति के संरक्षण का संकल्प और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील जीवनशैली का प्रेरक उदाहरण बनकर पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। जनार्दन और श्वेता ने अपने विवाह के माध्यम से यह साबित कर दिया कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े मंच की नहीं, बल्कि सशक्त सोच और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।

 

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