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नई शिक्षा नीति: सुधारों के दावे, बंद होते सरकारी स्कूल और जमीनी चुनौतियां

नीति आयोग की रिपोर्ट के संदर्भ में एहतेशाम परवीन की आलोचनात्मक अध्ययन

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के झारखंड प्रदेश सह सचिव एवं रांची जिलाध्यक्ष एहतेशाम परवीन नई शिक्षा नीति को लेकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

प्रदेश सह सचिव एहतेशाम परवीन ने 11 अगस्त को बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य शिक्षा को लचीला, बहुविषयक, डिजिटल, कौशल आधारित और समावेशी बनाना है। कहा कि एनईपी के तहत पीएमश्री, समग्र शिक्षा, निपुण भारत, पीएन ई-विद्या, दीक्षा, व्यावसायिक शिक्षा, अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स, मल्टीपल एंट्री-एग्जिट, स्वयं और डिजिटल शिक्षा जैसी कई पहल शुरू की गई हैं।

लेकिन किसी भी शिक्षा नीति का मूल्यांकन केवल योजनाओं और घोषणाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह देखना भी जरूरी है कि इन सुधारों का सरकारी स्कूलों, ग्रामीण छात्रों, गरीब परिवारों और शिक्षकों पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ रहा है।

एहतेशाम के अनुसार इसी संदर्भ में नीति आयोग की स्कूल शिक्षा पर रिपोर्ट महत्वपूर्ण सवाल उठाती है। रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2014-15 में देश में 11.07 लाख सरकारी स्कूल थे, जो 2024-25 में घटकर लगभग 10.13 लाख रह गए। यानी एक दशक में लगभग 94 हजार सरकारी स्कूल बंद कर दिया गया। यह आंकड़ा एनईपी 2020 के उस दावे के सामने एक गंभीर बहस खड़ा करता है, जिसमें शिक्षा को सभी के लिए सुलभ, समान और गुणवत्तापूर्ण बनाने की बात कही गई है।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के प्रमुख सुधार के तहत शिक्षा व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित और लागू किए गए हैं। स्कूल शिक्षा में पीएमश्री स्कूल, समग्र शिक्षा, निपुण भारत मिशन, विद्या प्रवेश, एनसीएफ-एफएस, जादुई पिटारा, निष्ठा, उल्लास जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए हैं।
वहीं डिजिटल शिक्षा में पीएम ई-विद्या, दीक्षा, स्मार्ट क्लासरूम, आइसीटी लैब, स्वयं, स्वयं प्रभा, ई-पीजी पाठशाला जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। कहा कि उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री एंड एग्जिट, अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स, नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क, मल्टीडिसिप्लिनरी एजुकेशन, आपार आईडी, दो डिग्री एक साथ करने की सुविधा, पीएम-विद्यालक्ष्मी जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया है।

कहा कि कौशल और रोजगार के क्षेत्र में व्यावसायिक शिक्षा, बैगलेस डेज, अपरेंटिसशिप, स्वयं प्लस, पीएम केवीवाई, एनएपीएस, एनएटीएस जैसे कार्यक्रमों पर जोर दिया गया है। जबकि सवाल यह कि इसी दौरान सरकारी स्कूलों की संख्या क्यों घटी? यह एनईपी 2020 पर सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक है।

एहतेशाम के अनुसार नीति आयोग के आंकड़े बताते है कि वित्तीय वर्ष 2014-15 देश में लगभग 11.07 लाख सरकारी स्कूल थे, जिसमें 2024-25 में लगभग 10.13 लाख सरकारी स्कूल रह गये। यानी लगभग 94,000 सरकारी स्कूलों की कमी। सरकार और नीति आयोग की ओर से इस कमी के पीछे कम नामांकन, जनसंख्या में बदलाव, स्कूलों का युक्तिकरण, विलय और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल जैसे कारण बताए जाते हैं।

इससे इतर ग्रामीण और गरीब विद्यार्थियों के दृष्टिकोण से सवाल अलग है कि अगर स्कूल ही दूर हो जाएगा, तो शिक्षा तक पहुंच कैसे आसान होगी? एक गांव का सरकारी स्कूल बंद या दूसरे स्कूल में विलय होने के बाद बच्चे को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ सकता है। इसका सबसे अधिक असर गरीब बच्चे + छात्राएं + छोटे बच्चे + आदिवासी विद्यार्थी + दूरदराज क्षेत्रों के विद्यार्थी पर पड़ सकता है। इसलिए स्कूलों का विलय प्रशासनिक रूप से उचित हो सकता है, लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक दृष्टि से उसकी कीमत भी देखना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों की संख्या कम होना केवल आंकड़ा नहीं है। कहा कि सरकारी स्कूल भारत की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। विशेषकर ग्रामीण भारत में गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का सबसे सुलभ और कम लागत वाला माध्यम हैं। कहा कि यदि सरकारी स्कूलों की संख्या लगातार कम होती है और इसके स्थान पर निजी स्कूलों का विस्तार होता है, तो शिक्षा पर परिवारों का खर्च बढ़ सकता है। इससे शिक्षा में आर्थिक असमानता और बढ़ने का खतरा है।

एहतेशाम ने कहा कि सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने स्कूल चल रहे हैं। सवाल यह होना चाहिए कि हर बच्चे के घर से गुणवत्तापूर्ण स्कूल कितनी दूरी पर है। एनईपी 2020 डिजिटल शिक्षा: अवसर या डिजिटल असमानता? केंद्र द्वारा डिजिटल शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। दीक्षा, पीएम ई-विद्या और स्मार्ट क्लासरूम जैसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को डिजिटल संसाधनों से जोड़ सकते हैं। लेकिन भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल संसाधनों की असमान उपलब्धता एक बड़ी समस्या है। कई परिवारों के पास स्मार्टफोन नहीं है, पर्याप्त इंटरनेट नहीं है, नियमित बिजली नहीं है, कंप्यूटर नहीं है। ऐसी स्थिति में डिजिटल शिक्षा का लाभ सभी विद्यार्थियों को समान रूप से नहीं मिल सकता।

उन्होंने कहा कि डिजिटल शिक्षा तभी समान शिक्षा बनेगी, जब डिजिटल संसाधनों तक समान पहुंच होगी अन्यथा डिजिटल क्रांति डिजिटल विभाजन को और गहरा कर सकती है। कहा कि एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या स्मार्ट क्लासरूम एक अच्छे शिक्षक का विकल्प हो सकता है? कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता का सबसे महत्वपूर्ण आधार आज भी शिक्षक है। ग्रामीण स्कूलों में यदि शिक्षक कम हैं, एक शिक्षक कई कक्षाओं को पढ़ा रहा है या शिक्षक पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ है, तो केवल स्मार्ट बोर्ड लगाने से शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ा बदलाव नहीं आएगा।

इसलिए सरकार को शिक्षक नियुक्ति + शिक्षक प्रशिक्षण + उचित पदस्थापन + कम कार्यभार पर समान रूप से ध्यान देना होगा। कहा कि निपुण भारत का लक्ष्य अच्छा है, लेकिन संसाधन जरूरी है। कहा कि निपुण भारत का लक्ष्य तीसरी कक्षा तक बच्चों में बुनियादी पढ़ने, लिखने और गणित की क्षमता विकसित करना है। यह लक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन ग्रामीण सरकारी स्कूलों में यदि पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, बच्चों की संख्या और कक्षाओं का अनुपात ठीक नहीं है, शिक्षण सामग्री सीमित है, नियमित मूल्यांकन नहीं होता, तो केवल मिशन घोषित करने से सीखने का स्तर नहीं सुधरेगा।

उन्होंने कहा knनई शिक्षा नीति की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए कई प्रमुख सवाल सामने हैं, जिसमें सरकारी स्कूलों की घटती संख्या, डिजिटल असमानता, शिक्षक संकट, शिक्षा का निजीकरण का खतरा, शिक्षा महंगी होने का खतरा, छात्रों से स्कूलों की दूरी, अमीर-गरीब के बीच शिक्षा का अंतर, मल्टीपल एंट्री-एग्जिट का असमान प्रभाव, कौशल शिक्षा का गलत इस्तेमाल, नीति और जमीनी क्रियान्वयन के बीच अंतर।
कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह कि आखिर शिक्षा किसके लिए? भारत जैसे विशाल और असमान देश में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या नई शिक्षा नीति का लाभ एक महानगर के विद्यार्थी और एक दूरदराज गांव के विद्यार्थी को समान रूप से मिल रहा है? क्या गरीब किसान, मजदूर, आदिवासी और ग्रामीण परिवार का बच्चा भी बिना आर्थिक बोझ के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर पा रहा है? क्या गांव के समीप पर्याप्त शिक्षक वाला सरकारी स्कूल है? क्या डिजिटल शिक्षा के लिए जरूरी संसाधन हैं? क्या उच्च शिक्षा तक पहुंचने का समान अवसर मिल रहा है?

कहा कि यदि इन सवालों का सकारात्मक उत्तर मिलता है, तभी एनईपी 2020 को वास्तव में समावेशी शिक्षा नीति कहा जा सकता है। कहा कि शिक्षा का आधुनिकीकरण जरूरी है, लेकिन सार्वजनिक शिक्षा का कमजोर होना इसकी कीमत नहीं होनी चाहिए। सरकारी स्कूल बचेंगे, तभी गरीब और वंचित बच्चों की शिक्षा का अधिकार मजबूत रहेगा।

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