एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। तीस दिनों की समयावधि में सूचना नहीं देने वाले जन सूचना पदाधिकारियों पर धारा 20 के तहत दंड सुनिश्चित करे राज्य सूचना आयोग। इसे लेकर सभी विभागों की तत्काल समीक्षा बैठक बुलाए। कांग्रेस पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना के अधिकार की पक्षधर है। आरटीआई कानून को कमजोर करने की किसी भी प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
झारखंड प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने झारखंड राज्य सूचना आयोग के राज्य सूचना आयुक्त को 28 जुलाई को पत्र लिखकर राज्य के सभी विभागों के जन सूचना पदाधिकारियों (पीआईओ) एवं प्रथम अपीलीय प्राधिकारियों की राज्यस्तरीय समीक्षा बैठक तत्काल बुलाने की मांग की है।
नायक ने कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 देश के लोकतंत्र को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक कानून है, जिसे पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता को शासन में भागीदार बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हमेशा सूचना के अधिकार, पारदर्शी शासन और जवाबदेह प्रशासन की प्रबल समर्थक रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड के अनेक विभागों, निगमों, बोर्डों, विश्वविद्यालयों तथा स्थानीय निकायों में सूचना का अधिकार अधिनियम का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।
हजारों रहिवासियों को कानून में निर्धारित 30 दिनों की समय-सीमा के भीतर सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। कहा गया कि कई मामलों में आवेदन महीनों तक लंबित रखे जाते हैं, अपूर्ण सूचना दी जाती है अथवा बिना वैधानिक कारण के सूचना देने से इनकार कर दिया जाता है। इससे आम रहिवासियों को अनावश्यक रूप से प्रथम अपील और द्वितीय अपील की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ऐसे में राज्य सूचना आयोग पर भी मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
उन्होंने पत्र में कहा है कि यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार अधिनियम की भावना और नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। कहा गया कि यदि जन सूचना पदाधिकारी कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं करते हैं तो उनके विरुद्ध अधिनियम की धारा 20 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने राज्य सूचना आयोग से मांग की कि राज्य के सभी जन सूचना पदाधिकारियों एवं प्रथम अपीलीय प्राधिकारियों की तत्काल राज्यस्तरीय समीक्षा एवं अभिमुखीकरण बैठक आयोजित की जाए और स्पष्ट निर्देश जारी किए जाए कि प्रत्येक सूचना आवेदन का निस्तारण 30 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जो अधिकारी बिना उचित कारण सूचना देने में विलंब करें या अधिनियम का उल्लंघन करें, उनके विरुद्ध धारा 20 के तहत आर्थिक दंड लगाया जाए तथा आवश्यक होने पर संबंधित विभाग को अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति भी भेजी जाए।
नायक ने पत्र में कहा है कि यदि राज्य सूचना आयोग इस दिशा में प्रभावी पहल करता है तो सूचना का अधिकार अधिनियम का बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित होगा। शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही मजबूत होगी। रहिवासियों का विश्वास बढ़ेगा तथा आयोग के समक्ष लंबित अपीलों और शिकायतों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। नायक ने कहा कि लोकतंत्र में सूचना छिपाना नहीं, सूचना देना शासन की जिम्मेदारी है। सूचना का अधिकार किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि प्रत्येक देशवासी का वैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है। राज्य सूचना आयोग को इस अधिकार की रक्षा के लिए और अधिक सक्रिय एवं प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए।
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