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फर्जी आंदोलनकारियों पर शिकंजा को ले आंदोलनकारी मोर्चा ने की जांच की मांग

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। झारखंड आन्दोलनकारी मोर्चा ने राज्य में आंदोलनकारियों की पहचान को लेकर चल रही कथित अनियमितताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

मोर्चा के केंद्रीय सदस्य धनंजय जायसवाल ने राज्य के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आन्दोलनकारी सूची में हो रही गड़बड़ियों की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। इस कदम से राज्य की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

क्या है पूरा मामला?

मोर्चा द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में वनांचल/झारखंड आन्दोलनकारी चिन्हीकरण आयोग की कार्य प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि आयोग द्वारा तैयार की गई सूची में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया है।

प्रमुख आरोप

उम्र में भारी विसंगति: शिकायत के अनुसार, 35 से 51 वर्ष आयु वर्ग को भी आन्दोलनकारी घोषित किया गया है, जबकि वास्तविक आन्दोलन के समय को देखते हुए असली आंदोलनकारियों की उम्र आज कम से कम 51 वर्ष से अधिक होनी चाहिए। कहा गया कि तथ्यों की अनदेखी करते हुए पात्रता के मूल मानकों को नजरअंदाज कर सूची तैयार की गई है। आरोप है कि पैसे लेकर जाली दस्तावेजों के आधार पर ऐसे जनों को सूची में शामिल किया गया, जिनका झारखंड आंदोलन से कोई संबंध नहीं रहा है।

दलाली और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

केंद्रीय सदस्य धनंजय जायसवाल ने अपने पत्र में साफ तौर पर कहा है कि इस पूरे प्रकरण में बिचौलियों और दलालों की सक्रिय भूमिका रही है। उनके अनुसार, इस तरह की अनियमितताओं से न केवल सरकारी योजनाओं और संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है, बल्कि झारखंड आंदोलन के असली सेनानियों और शहीदों के सम्मान को भी ठेस पहुंच रही है। उच्च स्तर पर पहुंची शिकायत मामले की गंभीरता को देखते हुए पत्र की प्रतिलिपि कई महत्वपूर्ण पदाधिकारियों को भी भेजी गई है, जिसमें राज्य के राज्यपाल सहित
अपर सचिव (गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग), महानिरीक्षक भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी)
मोर्चा की प्रमुख मांगें मोर्चा ने सरकार से कम उम्र में चिन्हित किए गए आंदोलनकारियों के दस्तावेजों की गहन जांच कर दोषी पाए जाने पर नामों को सूची से तत्काल हटाने, फर्जीवाड़े में शामिल आरोपियों और बिचौलियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग शामिल है।

पत्र के सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार जल्द ही चिन्हीकरण आयोग के कार्यों की समीक्षा कर सकती है और जरूरत पड़ने पर व्यापक जांच के आदेश भी दिए जा सकते हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला राज्य में बड़े घोटाले के रूप में सामने आ सकता है और कई आरोपियों पर कानूनी शिकंजा कस सकता है।

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