देव सेनापति स्कंद की माता होने के कारण नाम पड़ा स्कंद माता
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। वासंती नवरात्र के पांचवें दिन 23 मार्च को बिहार के सुप्रसिद्ध सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित दक्षिणेश्वरी काली मंदिर सहित विभिन्न देवी मंदिरों में माता दुर्गा के पांचवें स्वरूप स्कन्द माता की श्रद्धापूर्वक पूजा की गयी।
बताया जाता है कि देवी भगवान कार्तिकेय (जिनका एक नाम स्कंद है) की माता होने के कारण इन्हें स्कंद माता कहा जाता है। स्कंद माता की पूजा के लिए भक्तों ने 23 मार्च की सुबह नदियों व तालाबों में पवित्र स्नान कर स्वच्छ पीला वस्त्र धारण किया। उसके बाद चौकी पर माता की प्रतिमा एवं चित्र (जिसमें भगवान स्कंद उनकी गोद में हैं) स्थापित किया।
गंगाजल से शुद्धिकरण के बाद धूप, गंध, अक्षत और फूल अर्पित किया गया। माता को पीले फूल और केले का भोग एवं केसर युक्त खीर का भोग भी लगाया। पूजा के दौरान ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः का मंत्र जाप और प्रार्थना मंत्र सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी का वाचन वातावरण में गूंजता रहा।
ज्ञात हो कि, देवी स्कंद माता की पूजा से संतान सुख, दिव्य ज्ञान, मानसिक शांति और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। चार भुजाओं वाली देवी के दो हाथों में कमल पुष्प है। एक हाथ वर मुद्रा में है और एक हाथ से उन्होंने बाल रूप में भगवान स्कंद को गोद में थामा हुआ है। वे सिंह पर सवार हैं, लेकिन कमल के आसन पर भी विराजमान रहती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। वे ममता, प्रेम और करुणा की साक्षात मूर्ति हैं। उनकी गोद में बाल स्कंद का होना यह दर्शाता है कि शक्ति जब मातृत्व का रूप लेती है, तो वह अत्यंत कल्याणकारी हो जाती है।
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