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गुरु-शिष्य की परंपरा गंगा की धारा की तरह प्रवाहमान-आचार्य अनिल

प्रहरी संवाददाता/पेटरवार (बोकारो)। भक्ति के सन्दर्भ मे गुरू-शिष्य का सम्बन्ध ईश्वर से स्थापित करता है। ज्ञान के सन्दर्भ मे आत्मबोध कराता है। भक्ति और मुक्ति के मार्ग मे हेतु और सेतु गुरू ही होता है। जिस भक्त के पास भगवान स्वयं चलकर आ जाए फिर भी उसको अपनी साधना मे परिपूर्णता न दिखे, श्रीरामचरित मानस मे ऐसा ही एक भक्त है।

सुतीक्ष्ण भगवान के चरणो मे रति हो जाने पर संसार से विरति और उपरति किसी पृथक साधना का कोई स्थान ही नही रहता है। वह सहज संभव हो जाती है। सुतीक्ष्ण की रति भगवान के चरणो मे है। अद्वितीय चरित्र है। अद्भुत है उनकी ईश्वर निष्ठा।
यह उक्ति है आचार्य अनिल पाठक व्यास ‘वाचस्पति’ का, जो बोकारो जिला के हद में पेटरवार प्रखंड के अंगवाली स्थित मैथानटुंगरी स्थित धर्म संस्थान में आयोजित मानस के 29वें अधिवेशन में बीते 12 मार्च की रात प्रवचन कर रहे थे।

आचार्य अनिल पाठक व्यास ‘वाचस्पति’ ने कहा कि मुनि अगस्त के परम शिष्य ऋषि सुतीक्ष्ण पुराणो के पुनीत इतिहास मे एक ऐसे पात्र है, जो अपने गुरू को भगवान के दर्शन कराने का माध्यम बने। कहा कि सुतीक्ष्ण मन, वचन और कर्म से मात्र भगवान के ही उपासक है। उन्होने स्वप्न मे भी कभी किसी अन्य ईष्ट की उपासना नही की।

तीर्थस्थल वाराणसी से पधारे अच्युतानंद पाठक महराज ने अनुज लक्ष्मण की बड़े भाई श्रीराम के प्रति स्नेह व त्याग के प्रसंग का बेवाक विश्लेषण किया। वहीं मानस कोकिला नीलम शास्त्री ने भाई भरत की बड़े भाई श्रीराम के प्रति सच्चा प्रेम व स्नेह का सटीक वर्णन किया। ज्ञात हो कि 13 मार्च को आयोजन स्थली पर प्रातः से हवन के साथ हजारों श्रद्धालुओं ने यज्ञ मंडप का परिक्रमा किया।

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