एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विजय शंकर नायक ने 3 मई को कहा कि देश की सत्ता में कॉर्पोरेट गठजोड़ का कड़वा सच जंगलों की कीमत पर विकास, आदिवासी बेघर, लापता जंगल व् खतरे में देश का भविष्य कहा है।
नायक ने कहा कि भारत सदियों से प्रकृति और मानव के संतुलन का प्रतीक रहा है। यहाँ जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व का आधार रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों के लिए जंगल उनकी पहचान है। नदियाँ, पहाड़ और वन उनके पूर्वजों की स्मृतियाँ हैं। लेकिन आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ विकास का पैमाना सबसे शक्तिशाली बना दिया गया है। इसके नाम पर जंगलों, नदियों और समुदायों को बलि चढ़ाया जा रहा है।
नायक ने कहा कि भाजपा सरकार के दौर में विकास का मॉडल तेजी से सत्ता-कॉर्पोरेट गठजोड़ में बदलता दिख रहा है। जहाँ प्राकृतिक संसाधनों को बड़े उद्योगों के लिए खोल दिया गया है और चारो तरफ विकास के नाम पर वनों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। कहा कि मानव जाति तथा देश का भविष्य खतरे में है।
उन्होंने कहा कि यह विकास है या विनाश? कहा कि आंकड़े खुद गवाही देते हैं कि पिछले एक दशक (2014–2023) में 1.5 लाख हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को उद्योगों के लिए डायवर्ट किया गया है। अनुमानित 2 से 3 करोड़ पेड़ काटे गए। सबसे ज्यादा हिस्सा कोयला खनन, हाईवे, रेलवे और औद्योगिक प्रोजेक्ट्स में गया। कहा कि यह केवल आंकड़े नहीं बल्कि यह भारत के पर्यावरण, वन्यजीव और आदिवासी समाज के विनाश की कहानी है।
नायक के अनुसार सरकार दावा करती है कि फॉरेस्ट कवर बढ़ रहा है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक घने जंगल घट रहे हैं, उनकी जगह प्लांटेशन लगाए जा रहे हैं। जैव विविधता खत्म हो रही है, यानी कागज पर हरियाली, जमीन पर बर्बादी। जिसमें ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट के नाम पर 130 से 166 वर्ग कि.मी. (13,000 से 16,000 हेक्टेयर) जंगल प्रभावित। 50 से 60 लाख पेड़ों की कटाई का अनुमान। कहा कि यह क्षेत्र जैव विविधता का हॉटस्पॉट है। फिर भी इसे मेगा पोर्ट, एयरपोर्ट और टाउनशिप के लिए साफ किया जा रहा है। एक ही प्रोजेक्ट में इतने बड़े जंगल का खत्म होना अभूतपूर्व है।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य जहां दस हजार से अधिक हेक्टेयर जंगल सीधे प्रभावित, 5 से 7 लाख पेड़ों की कटाई का अनुमान। यह क्षेत्र हाथी कॉरिडोर और आदिवासी जीवन का केंद्र है। फिर भी कोयला खनन के लिए इसे खोल दिया गया। क्या यह विकास है या जंगलों की बलि? नायक के अनुसार उत्तराखंड में चार धाम हाईवे प्रोजेक्ट के तहत 900 कि.मी. सड़क विस्तार, जिसमें 50 से 70 हजार पेड़ों की कटाई हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भारी कटाई और खुदाई के कारण भूस्खलन बढ़े, पर्यावरणीय अस्थिरता बढ़ी। आस्था के नाम पर पर्यावरण से खिलवाड़ है।
कहा कि अरावली पर्वतमाला जहां 30 से 40 प्रतिशत हरित आवरण में गिरावट (दीर्घकालिक), लाखों पेड़ अवैध खनन में खत्म। यह क्षेत्र उत्तर भारत की जलवायु सुरक्षा का आधार है। फिर भी सरकार की निष्क्रियता ने इसे खत्म होने दिया। नायक के अनुसार पूर्वोत्तर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स जिसमें दस हजार से अधिक हेक्टेयर जंगल क्षेत्र प्रभावित, लाखों पेड़ों की कटाई, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के प्रवाह पर असर पड़ा है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का खामियाजा आने वाली पीढ़ियाँ भुगतेगी। गोवा व् कर्नाटक के पश्चिमी घाट जहां विकास के नाम पर एक से दो हजार हेक्टेयर जंगल नही प्रभावित, लगभग दो लाख पेड़ों की कटाई। यह क्षेत्र विश्व धरोहर है, फिर भी खनन और रेलवे के लिए खतरे में है।
नायक के अनुसार हर प्रोजेक्ट में एक ही कहानी दिखती है, जंगल, कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट, सरकारी मंजूरी, विरोध, दमन व् विनाश। यह संयोग नहीं, एक पैटर्न है जो हमे एक सुनियोजित षडयंत्र और सोची समझी साजिश की ओर इशारा करती है।
नायक के अनुसार देश में आदिवासी आबादी 8.6 प्रतिशत, मूलवासी आबादी 60 प्रतिशत लेकिन विस्थापन में आदिवासी का हिस्सा 40 प्रतिशत से अधिक, मूलवासी का हिस्सा 30 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि जंगल कटते हैं तो जमीन जाती है। रोजगार खत्म होता है। सभ्यताएं और संस्कृति मिटती है। विस्थापन के बाद उन्हें मिलता है न घर, न काम, न सम्मान। यह विकास नहीं बल्कि यह सरसार घोर अन्याय है।
नायक ने केंद्र की भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वर्तमान केंद्र सरकार के कार्यकाल में पर्यावरण कानून कमजोर किए गए, जनसुनवाई प्रक्रिया सीमित की गई, कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता दी गई। वन्यजीव और पर्यावरण संकट में है। वन क्षेत्र में हाथी कॉरिडोर टूटे, बाघों का आवास सिकुड़ा, मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा है। कहा कि जब जानवर शहरों में आते हैं, तो दोष उनका नहीं, दोष उस सिस्टम का है जिसने उनका घर छीन लिया। कहा कि अगर यही मॉडल जारी रहा तो भविष्य में देश में जल संकट बढ़ेगा, तापमान बढ़ेगा, बाढ़ और सूखा सामान्य होंगे। आज का विकास, कल की तबाही बन सकता है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी का मानना है कि देश में विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति और आमजनों की कीमत पर नहीं। यह पारदर्शी पर्यावरण मंजूरी ग्राम सभा की सहमति, आदिवासी मूलवासी समाज के अधिकारों की रक्षा तथा हरित क्रांति और टिकाऊ विकास के साथ संभव है। उन्होंने कहा कि अब फैसला जनता को करना है। कहा कि देश आज दो रास्तों पर खड़ा है। कॉर्पोरेट मुनाफा + जंगलों का विनाश, संतुलित विकास + पर्यावरण संरक्षण। क्या भारत का भविष्य कुछ कॉर्पोरेट घरानों के लिए है या 140 करोड़ जनता के लिए? कहा कि पिछले 10 वर्षों में 1.5 लाख हेक्टेयर जंगल और करोड़ों पेड़ों की बलि देकर जो विकास खड़ा किया जा रहा है वह भारत का भविष्य नहीं, बल्कि बर्बादी की नींव है। यह लड़ाई सिर्फ जंगलों की नहीं, बल्कि देश के अस्तित्व की लड़ाई है।
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